GM Mustard, ईस्ट-इंडिया कम्पनियाँ एवं काठ के घोड़ों की फ़ौज - भाग 1
Control oil and you control nations; control food and you control the people: The Alfred Kissinger Return

| June 15, 2017 | 10 Comments

भारत में खाद्य तेल पर विदेशी नियंत्रण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

“Control oil and you control nations; control food and you control the people.”

ये शब्द थे 1969-75 के दौर में, अमेरिका के राष्ट्रपति Richard Nixon एवं  Gerald Ford के कार्यकाल में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे, 56th United States Secretary of State, डिप्लोमेट एवं अमेरिका के राजनेता Henry Alfred Kissinger के!

Alfred Kissinger का मानना था, कि अगर आपको किसी देश पर नियंत्रण करना है, तो उसके तेल को नियंत्रण में ले लो; और अगर आपको लोगों पर नियंत्रण करना है, तो उनके खाने (फ़ूड) को नियंत्रण में ले लो |

Alfred Kissinger ने यह बयान किसी कूटनीति के तहत दिया था, जल्दीबाजी में दे दिया था, या वह निडर व्यक्तित्व के धनी थे, ये तो मुझे पता नहीं, किन्तु इतना निश्चित है कि उनके इस बयान से अमेरिकी की पूरे विश्व पर राज करने की कूटनीतिक महत्वाकांक्षा का खुलासा तो साफ़-साफ़ शब्दों में हो ही गया था|

अमेरिका तो अपनी इस कूटनीति पर न जाने कितने दशकों से कार्य कर रहा होगा, किन्तु भारत को इसका अहसास सर्वप्रथम 1986 में हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने पाया कि भारत का – तेल (फ्यूल), खाद (फ़र्टिलाइज़र) एवं खाद्य  तेल (edible oils) का बिल साल-दर-साल लगातार बढ़ता ही जा रहा था|

भारत आजाद हो चुका था – किन्तु भारत का, सिर्फ खाद्य तेल का वार्षिक आयात बिल – Rs 1500 से Rs 3000 करोड़ रूपये तक पहुँच चुका था, जो एक चिंता का विषय था|

ऐसा नहीं था कि उस समय भारत में खाने के तेल की खेती नहीं हो रही थी, या कम हो रही थी – वास्तव में जहाँ 1950-51 में भारत 10.73 m ha भूमि पर तिलहनी फसलों की खेती करता था, वही 1985-86 में यह आंकड़ा 19.02 m ha तक पहुँच चुका था; किन्तु भारत में खाद्य तेल का उत्पादन मात्र 10-11 मिलियन टन प्रतिवर्ष पर अटका हुआ था|

मै तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी को दृढ इच्छा शक्ति के धनी, विचारक एवं दूरदर्शी इत्यादि की संज्ञा नहीं दूंगा, क्योकि यह काम या तो राजनेता करें, या समाज के ठेकेदार; किसी व्यक्ति विशेष के बारे में ऐसा विश्लेषण एक वैज्ञानिक के ज्ञान क्षेत्र से बाहर का विषय है – किन्तु वैज्ञानिक – तथ्यों को क्रमशः ज्यों का त्यों उजागर तो कर ही सकता है! और इस क्रम में अगर कोई व्यक्ति विशेष अपने आप ही ‘दृढ इच्छा शक्ति का धनी, विचारक एवं दूरदर्शी सिद्ध हो जाये – तो इसमें वैज्ञानिक का कोई निजी स्वार्थ या अस्वार्थ न माना जाये!

श्री राजीव गांधी  नें भारत देश में May 1986 में एक अति महत्वाकांक्षी नीति की घोषणा की – जिसका नाम था ‘Technology Mission on Oil seeds’.

इस योजना के जन्म और मृत्यु की सच्चाई यहाँ लिखे बिना – वर्तमान की GM Mustard की रक्तबीज गाथा अधूरी रह जायेगी!

Technology Mission on Oil seeds – भारत की पीली क्रांति

खाने का तेल देश के लिए अति महत्वपूर्ण commodity था, श्री राजीव गाँधी यह पूर्णतः समझ चुके थे| श्री राजीव गांधी के Technology Mission on Oil seeds का सिर्फ एक उद्देश्य था – कि अगले चार वर्षो में 1990 तक भारत के खाद्य तेल का उत्पादन 10-11 मिलियन टन प्रतिवर्ष से बढाकर – 16-18 मिलियन टन प्रतिवर्ष कर दिया जाये|

खेतों में मेहनत करने से फसल उगती है, पैदावार बढ़ती है, ये तो ठीक है,राजनीति से राजा बनते, उतरते रहते हैं, ये भी ठीक है; किन्तु राजनीति से किसी फसल की पैदावार कैसे बढ़ सकती थी ?

किन्तु पैदावार बढी, और इतनी बढी कि भारत सिर्फ चार सालों में वर्ष 1990 तक अपने खाद्य तेल की कुल जरुरत का 97% स्वयं अपने खेतों खलिहानों में पैदा करने लगा | पूरा विश्व भारत की इस ‘क्रांति’ को देख रहा था और सन्नाटे में था|

श्री राजीव गाँधी के  फरवरी 1986 में दिए गए भाषण के यें अंश इतिहास में दर्ज हैं और अपने आप में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है –

“One of our biggest problems today in the agricultural sector is oilseeds .We are setting up a thrust Mission for oilseeds production. When we talk of a Mission, we mean an exercise starting from the engineering of the seeds and finishing with the finished products of the vegetable oil ( and the byproducts like oil meal) which could be delivered to the consumer. We would like to put one person incharge of such a Mission with full funding, with no restrictions on him, whether bureaucratic or otherwise. The only limits will be certain achievements which must come within a certain time frame. This will cut across a number of ministries…!!”

इस घोषणा के मात्र तीन महीने बाद भारत में ‘ओयल सीड फसलों का टेक्नोलॉजी मिशन’ लागू कर दिया गया था| इतने वृहद, एवं वैज्ञानिक तरीके से कम योजनायें ही भारत देश में लागू हो पाती हैं! Technology Mission on Oil seeds उनमें से एक थी|

✓ इस योजना के तहत सबसे पहले किसान तक जानकारी पहुँचाने के लिए एक्सटेंशन सर्विसेज की शुरुवात की गयी|

✓ फिर देश में जो भी high yielding varieties थी, उनका सही विश्लेषण करके उनको किसानो को उपलब्ध करवाया गया| देश के वैज्ञानिकों को देश की अनुसंधानशालाओं में ही नयी-नयी varieties develop करनें के लिए प्रेरित किया गया, उसके लिए समुचित धन दिया गया| यही वह समय था जब देश में तिलहनी फसलों की दो सो से ज्यादा किस्में वैज्ञानिको ने भारत में रिलीज़ की!

✓ तेल का high minimum support price (MSP) निर्धारित किया गया और किसानो को तिलहनी फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया|

✓ खाने के तेल को ‘negative list’ में डाल दिया गया – अर्थात तेल के खुले आयात पर पूर्ण प्रतिबंध| केवल स्टेट एजेंसीज को ही इसकी परमिशन दी गयी| जो highly रेगुलेटेड थी|

देश की इस महत्वाकांक्षी योजना की कमान संभाली देश के ही एक वैज्ञानिक ने!

भारतीय वैज्ञानिक late Dr. M.V. Rao की लीडरशिप में इस मिशन को देश में दृढ़ता से चलाया गया| Dr. M.V. Rao नें विभिन्न मंत्रालयों, ICAR, DARE एवं कृषि विश्वविद्यालयों का सफलता पूर्वक coordination किया| कृषि मंत्रालय ने भी इस कार्य में जम कर सहयोग दिया और परिणाम पुरे विश्व के सामने था –

इन पॉलिसियों ने जादू जैसा काम किया था – और देश सिर्फ चार सालों में वर्ष 1990 तक अपने खाद्य तेल की कुल जरुरत का 97% स्वयं अपने खेतों खलिहानों में पैदा करने लगा|

और वर्ष 1995 तक तो देश अपने रिकॉर्ड 21 million tons तेल के प्रोडक्शन के साथ – तेल के आयात करने के स्थान पर, तेल का निर्यात करने लगा था !

इतिहास के पन्नों में भारत की यह उपलब्धि “The Yellow Revolution” अर्थात ‘भारत की पीली क्रांति” के नाम से स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है|

आह! संसार के कुछ देशों से भारत की यह समृद्धता देखी ना गयी!

यह भारत पीली क्रांति ही तो थी,जो विश्व के कुछ कुटिल देशों की आंख में रोड़ा बन कर अटक गयी थी ! विदेशों में भारत की पीली क्रांति  को ध्वस्त करनें की खतरनाक योजनायें बन कर तैयार थी – बस उनको चरणबद्ध तरीके से भारत में लागू करवाने भर की देर थी!

भारत की पीली क्रांति का अंत! End of the Yellow Revolution of India!

कई बार मुझे लगता है, कि भारत एक देश नहीं ‘एक आदमी’ है – वो ‘आदमी’ चलता है तो देश चलता है, वो ‘आदमी’ रुकता है तो देश रुक जाता है; वो ‘आदमी’ जगता है तो देश जगता है, और वो ‘आदमीं’ मर जाता है तो देश मर जाता है!

यह तेल का अघोषित युद्ध था! इतिहास गवाह है, कि तेल ने तो देश के देश तबाह करवा दिए – भारत के उस ‘एक आदमीं’ को जिससे देश चलता और रुकता है – तबाह करना क्या बड़ी बात थी!

भारत के दुश्मनों को भारत का यह पासवर्ड समझ में आ गया था! वर्ष 1991 में श्री राजीव गांधी की हत्या करवा दी गयी! और उसके बाद शुरू हुआ भारत में राजनीतिक अस्थिरता का दौर!

कोई सरकार साल भर चली तो कोई सिर्फ 16 दिन| भारत की राजनीति के शीर्ष पर बैठा वो ‘आदमी’ बदलवाया जाता रहा – और तब तक बदलवाया जाता रहा जब तक कि तेल के विदेशी षड्यंत्रकारियों को उनके मतलब का ‘आदमी’ नहीं मिल गया!

1994-95 में जब Sri P. V. Narasimha Rao नाम के एक राजनीतिज्ञ भारत की राजगद्दी पर बैठे थे – तभी तेल के सौदागरों नें देश में अपनी घुसपैठ शुरू कर दी थी ! यही वह समय था जब भारत ने  1986 में शुरू हुआ तेल के आयात पर प्रतिबन्ध धीरे-धीरे उठाना शुरू कर दिया था!

1 जून 1996 को H. D. Deve Gowda नाम के एक राजनीतिज्ञ नें भारत की कमान सम्भाली ! मुझे नहीं पता – और मै यह जानने और बताने में इंटरेस्टेड भी नहीं हूँ, कि श्री देवगौड़ा और श्री नरसिम्हा राव किस राजनीतिक पार्टी से जुड़े थे- वो पार्टी कैसी थी- क्यों थी और क्यों नहीं थी- उनका अपना व्यक्तित्व कैसा था, क्यों था और क्यों नहीं था – क्योकि मैं एक वैज्ञानिक हूँ, और विज्ञान निजी लाभ हानि से बहुत ऊपर उठकर, सच्चाई के धरातल पर, निस्वार्थ भाव से दृढ़तापूर्वक, सिर्फ तथ्यों की बात करता है – उन्ही का विश्लेषण करता है – व्यक्तियों एवं वयक्तित्वों की नहीं|

1 जून 1996 को प्रधानमंत्री बनने के सिर्फ डेढ़ माह बाद – 23 July 1996 को श्री देवगौड़ा नें सबसे पहला काम जो किया वो था भारत की पीली क्रांति को पूर्ण रूप से मृत्युदंड देना!

23 July 1996 को भारत के एक दशक पुराने Technology Mission on Oil seeds के तहत जो एडिबल आयल के आयात पर प्रतिबन्ध लगाया गया था, उस प्रतिबन्ध को उठा लिया गया ! Open General License (OGL) नाम की एक नयी नीति की घोषणा कर दी गयी!

जैसे ही भारत में तेल के आयात पर प्रतिबन्ध हटा – अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील, मलेशिया जैसे देश, जो एक दशक से अपनें अजगर जैसे मुंहों में न जाने कितने बिलियन गैलन तेल भरे बैठे थे – ने पूरा का पूरा तेल एक ही फुंकार के साथ भारत में उड़ेल दिया| परिणाम –  जहाँ सिर्फ एक वर्ष पहले तक 1995 में भारत तेल का एक निर्यातक देश बन  चुका था – 1996-97 में उसी भारत में विदेशी तेल की खरीद का बिल आया लगभग $1 billion अमेरिकी डॉलर!

विदेशी पाम आयल और अमेरिका के सुअरों के खाने की सोया केक बनाने के बाद बचा सोयाबीन का रिफाइंड आयल  भारत के बाजारों में धकेला जा चुका था! भारत का मेहनती किसान सदमें में था! उसे समझ ही नहीं आ रहा था, कि वो अपने उगाये देसी तेल का करे तो क्या करे!

भारत की पीली क्रांति की मौत हो चुकी थी!!

किंतुं उन विदेशी खूंखार अजगरों का मन अभी भी नहीं भरा था! उनकी सिर्फ एक फुंकार ने भारत के मेहनती किसान को कंगाल तो बना दिया था, पर अभी भी वह किसान साँसे ले रहा था! देश के शीर्ष पर बैठे, भारत को चलाने वाले उस ‘एक आदमी’ को तो उन्होंने पहले ही लोरियां दे कर सुला दिया था शायद! वो आदमीं सो गया तो देश को तो सोना ही था!

और जब देश सो रहा था, उन अजगरों नें दिल्ली के बाजारों में जितना भी भारत के मेहनती और कंगाल किसानों द्वारा उगाया गया देशी तेल का स्टॉक था, उस सारे के सारे स्टॉक में आर्जीमोन, डीजल, waste आयल, न जाने क्या क्या मिलवा दिया! यह समय था 1997-1998 का| यही समय था जब हम भी गाँव में सुना करते थे- कि देसी तेल, एवं देसी डालडा में सुअर की चर्बी मिली हुयी है!

अजगर का काम हो चुका था!

अजगर में भारत को चलाने वाले सोये हुए उस ‘एक आदमी’ को फिर से नींद से उठाया और उसे एक नयी घोषणा करने का आदेश दे दिया!

August 27, 1998 को भारत के उस एक आदमीं नें फिर से मुंह खोला – और आदेश दिया कि दिल्ली में भारत के कंगले किसानो द्वारा उगाये गए देसी तेल में डीजल मिला है – इसलिए यह देसी मस्टर्ड बिलकुल नहीं बिकेगा! बिकेगा तो सिर्फ और सिर्फ – विदेशी सोया का तेल !

August 27, 1998 को उस ‘आदमीं’ नें सोयाबीन के तेल के फ्री इम्पोर्ट की पालिसी की घोषणा कर दी और साथ ही साथ मुहर लगा दी देश के कंगले तेल किसानों के अंतिम संस्कार की तैयारियों पर! पूरे देश नें मरे हुए किसानों की अर्थियों पर सोने जैसा चमकता हुआ सोयाबीन का रिफाइंड तेल खरीद-खरीद कर चढ़ाया| अपने इस कर्तव्य की इति-श्री करके देश नें फिर चैन की सांस ली और पुनः सो गया!

क्रमशः…………..

GM Mustard, ईस्ट-इंडिया कम्पनियाँ एवं काठ के घोड़ों की फ़ौज – भाग 2 में पढ़िए आगे की कहानी……भाग एक पर आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा…..

डॉ सुनील कुमार वर्मा (डी. फिल. यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफ़ोर्ड)

Untold Story of GM Mustard - काठ के घोड़ों की फ़ौज

किंतुं उन विदेशी खूंखार अजगरों का मन अभी भी नहीं भरा था! उनकी सिर्फ एक फुंकार ने भारत के मेहनती किसान को कंगाल तो बना दिया था, पर अभी भी वह किसान साँसे ले रहा था! देश के शीर्ष पर बैठे, भारत को चलाने वाले उस ‘एक आदमी’ को तो उन्होंने पहले ही लोरियां दे कर सुला दिया था शायद! वो आदमीं सो गया तो देश को तो सोना ही था!…..क्रमशः

1,382 total views, 3 views today

Did you like this article? Please rate it.
[Total: 17 Average: 4.4]
Submit your review
1
2
3
4
5
Submit
     
Cancel

Create your own review

Tags: , , , , ,

blank

About the Author ()

Dr Sunil Kumar Verma is an experienced Principal Scientist with a demonstrated history of working in the research industry for more than 20 years. Skilled in Molecular Medicine, Genetics, Translational Research and Wildlife Forensics, Dr Verma has done his doctorate from the University of Oxford. UK. He had been the inventor of 'Universal Primer Technology' (US Patent 7141364), which led to the establishment of India's first wildlife forensics cell in the LaCONES of CCMB to provide wildlife forensics services to the nation. He is also the recipient of several national and international awards and honours, including the 2008 CSIR Technology Award, the 2009 NRDC Meritorious Invention Award of Govt. of India and the 2009 BioAsia Innovation Award in recognition of his contribution to Indian science and technology.

Comments (10)

Trackback URL | Comments RSS Feed

  1. Rajesh kanchan says:

    धन्यवाद डॉ साहब इस बहुमूल्य जानकरी के लिये ।

  2. Nitin Shukla says:

    वाह क्या बात है, एक वैज्ञानिक की लिखी बातों पर मैं आंख बंद कर के विश्वास कर सकता हूँ क्योंकि वो राजनीतिक नही होता, ऐसी ज़बरदस्त जानकारी देने के लिए आपको कोटि कोटि प्रणाम, बल्कि देश के अन्य वैज्ञानिक भी आगे आएं और देशवासियों के सामने सच को रखें, ताकि हम अपनी की गई गलतियों से सबक ले सकें और आगे बढ़ें

  3. Hari Har Ram says:

    Dear Dr. VERMA,
    I have gone through your article on oil and oilseed production in India pointing out certain villains and certain heroes related to so called yellow revolution. I have few brief comments.
    1. In true sense India was never edible oil exporting country forgetting of course stray instances of insignificant export here and there and those stray cases are happening in several commodities.
    2. Drawing a correlation between number of cultivars released (where majority remains only on paper) and increased production is misplaced. Had it been so, our pulse production scenario would have been much better by now.
    3. A few cases mentioned as animal fat in Dalda, ban on sale of loose mustard oil ,etc have never changed the major line of production and business. They were one of the kind events.
    4. Yes, oilseed production scenario got real boost in India by introducing, research and commercialization of soybean in India initiated by late Dr. Dhyan Pal SINGH, VC, Pantnagar and as a result India grows 10 million ha soybean now as compared to 50000 ha initially. He is the real hero of turning point for increased oil production in India which still remains less than the demand.

    • My reply to Hari Har Ram सर:

      Thanks for sparing your time sir to read what I have written.
      I am bit nationalist type scientist – and I try to appreciate even the small work and contribution, if it is done by anyone with honesty and selfless feeling. This article was certainly not to assess and describe the personalities (this is also mentioned in article at several places) but to bring out the facts in simple language that could be understood by readers. While doing so, some individuals might have been given more credit and some less – but the collective fact for the country remains same.

      Variety release on paper!

      This is a great topic in itself, and deserve separate series of articles. Farmer do not release variety, Scientists release. I myself am a scientist, and inventor. My invention is currently used by entire nation and I need not to mention it here, since that is not the subject of discussion. But believe me, bringing any invention from paper to practice is not one person’s work! Due to lack of support system in this country, one has to burn his own home first to bring the invention from ‘paper to practice’ even after the invention is done. I have experienced it myself!

      Why we should expect all scientists to do all sacrifice. Their job is to do invention, rest comes political will, and systems support to take his/her invention to next level. If some improved varieties of agriculture crops discovered/developed by scientists remain on paper only, it is a national loss! And country should not tolerate such loss!

      Your above statement is very important, and you have answered here your own question, why India dont produce enough oil still! And this indeed is a real cause that the venomous snakes of idea such as ‘GM Mustard’ get opportunity to grow and evolve! This discussion in next part(s) of article, please wait.

      Ban on the sale of local product

      Unfortunately, India is a rumour based society. I have seen people queuing for salt recently when there was rumour that salt price is going to become very high. A small spark is enough here to make the people do or dont do anything, right or wrong. If farmer of Delhi know that local oil is banned in market, that echo you can hear from north to south and south to west. Result would be action, right or wrong. I still remember, we ourselves stopped buying local oil/dalda etc in those years. If there will be no market, why farmer will grow. This formula was the one which was used n this case to kill the cause of indigenous oil in the country.

      I have requested your kindself to provide me a small right up on the contribution of Dr. Dhyan Pal SINGH, VC, Pantnagar during 1969 to 1975. I am also student of Pantnagar university (1991 batch) and it would be my great pleasure to include a full article about the contribution of Dr. Dhyan Pal SINGH in Vigyaan. You have promised me that you will send this write-up. I will wait for the same, sir.

      Regards.

      Dr Sunil Kumar Verma

  4. SATENDRA sharma says:

    Good article sir

  5. tejasvi says:

    Need of hour is to incentivise agriculture for products we are deficient. Import is not solution it can at best be short term to tide over crisis. Only the commodity which we cannot produce, invent, find indigenous alternative, or cannot survive without should be imported.

    Swaraj, self sufficient, swadheenta can be achieved then only, to be developed nation jai Jawan jai kisan spirit to the core of policies, R&D is indispensable. We as nation must learn from history of invasions & their tactics of persistence, destruction of our roots psychology. We still are made to believe that west is best, everything developed countries do is good. We still are following colonial policies, politics, law & it’s enforcement. Our education, socioeconomic structure still preaches west is best. Cream of our society is consequently migrating to west & our best human resources are serving them. Which we feel proud about whereas it’s a shame for a nation to be unable to channelise it’s own rich resources.

    Greed of some traitors in decision, policies making, implementation; & overburdened under staff law enforcement are pursuing nation to socioeconomic slavery.

  6. कौशल says:

    आप जो कर रहे हैं उसे मैं असली वैज्ञानिक क्रांति कहूँगा । वैज्ञानिक क्षेत्रों में छाये घने काले बादलों के प्रति दुनिया को सचेत करना अपने आप में एक बहुत बड़े साहस का काम और एक युद्ध है । हम आपके साथ हैं ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *