GM Mustard, ईस्ट-इंडिया कम्पनियाँ एवं काठ के घोड़ों की फ़ौज - भाग 2
GMO Emperors! Are you up to feeding India -or fooling India? SACCHARIN!

| June 15, 2017 | 4 Comments

GM Mustard, ईस्ट-इंडिया कम्पनियाँ एवं काठ के घोड़ों की फ़ौज – भाग 1 से आगे…

वैसे तो हर बड़ा तूफ़ान किसी छोटी-मोटी आंधी से शुरू होता होगा| वैसे तो हर बड़े ज्वार-भाटा की शुरुवात भी किसी छोटी समुंद्री हलचल से ही शुरू होती होगी; किन्तु हर छोटी मोटी आंधी, हर समुंद्री हलचल कितना बड़ा रूप लेने की सामर्थ्य रखती है, इसका अनुमान लगाने का यन्त्र आजतक नहीं बना!

August 17, 1859 को John Francis Queeny नाम के बालक का अमेरिका में जन्म भी शायद ऐसी ही ब्रह्माण्ड की कोई छोटी मोटी हलचल हो!  किसने सोचा होगा की मात्र १२ वर्ष की आयु में बाल मजदूर के रूप में मात्र $2.5 प्रति सप्ताह के बदले में, अमेरिका की ही Tolman and King नाम की एक wholesale drug company में काम करने वाला यह छोटा सा बालक मात्र  40 वर्ष की आयु में एक ऐसी कंपनी की स्थापना करेगा, जो बाद में पूरे विश्व में अपने नाम का डंका बजवा देगी| जिसके सामने विश्व भर के आम आदमी, किसान और किसान नेता तो क्या, बड़े बड़े नीतिज्ञ और राजनीतिज्ञ और बड़े बड़े देश भी पानी भरते नजर आयेंगें…….कि जिसको कोई विचारशील लेखक ईविल कारपोरेशन (शैतान की कारपोरेशन) की संज्ञा देगा, (1) तो कोई भारत और भारत जैसे दर्जनों देशों पर राज करने वाली समकालीन ईस्ट इंडिया कंपनी (Contemporary East India Company) की….!  (2)

23 January 1897 को जन्में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, जिन्होंने बाद में अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के दांत खट्टे कर दिए थे – मात्र तीन या चार वर्ष के रहे होंगे, जब वर्ष 1901 में अमेरिका में Monsanto नाम की कंपनी का जन्म हो गया| Monsanto के आकाओं को शायद आभास था, कि नेताजी जैसे लोगों को तो अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी लील ही लेगी, और नेताजी जैसे लोग बार-बार पैदा नहीं होते |

Sweet and Low

Image Source: https://goo.gl/EhsWga

Monsanto नें 1901 में अपनें निर्बाध सफ़र की शुरुवात की कृत्रिम स्वीटनर सैकरीन (Saccharin) से | Monsanto ने इस सैकरीन को अन्य कथित जहर बनाने वाली कंपनी – कोका-कोला  (3)(4) को बेचा और कोका-कोला नें इसे लगभग सत्तर सालों तक लोगो को पतला रखने वाली डाइट कॉक इत्यादी में डालकर जी भर कर पिलाया| डायबिटीज के मरीजों ने भी इस saccharin का उपयोग खूब इतरा-इतरा कर किया कि उन्होंने अपनी डायबिटीज को सैकरीन से चकमा दे दिया शायद!

उन सबको शायद नहीं पता था कि चकमा वो Monsanto की सैकरीन से अपने स्वास्थ्य को नहीं, सैकरीन उनके स्वास्थ्य को दे रही थी|

लगभग सत्तर सालों तक सैकरीन का उपयोग करने के बाद इंसानों को समझ में आने लगा था कि सैकरीन एक खतरनाक किस्म का कैंसर पैदा करने वाला केमिकल था| (5)(6)

1970 के दशक में किये गए विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया कि सैकरीन से यूरिनरी ब्लैडर में खतरनाक किस्म का कैंसर हो जाता है जो males में females की अपेक्षा ज्यादा होता है !

“The male of the human species ingesting saccharin, as for rats, is more susceptible to carcinogenesis of the urinary bladder than the female” (6)

ज्यादा समय तक सैकरीन खाने वालों को इस कैंसर का खतरा ज्यादा रहता है |

“The risk ratios for urinary bladder carcinomas in human beings increase with both frequency and duration of saccharin usage.” (6)

यूरिनरी ब्लैडर ही नहीं – सैकरीन से शरीर के विभिन्न अंगों में तरह तरह के कैंसर नोट किये गए| यहाँ तक कि अगर गर्भवती माताओं नें सैकरीन का सेवन किया हो तो उनके बच्चे भी कैंसर के प्रति susceptible पाए गए | (6)

इन सब वैज्ञानिक अध्ययनों का परिणाम यह हुआ कि 1981 में (लगभग 80 वर्षों तक इंसानों को बेलगाम सैकरीन खिलाने के बाद) अमेरिका के National Institute of Environmental Health Sciences (NIEHS) की यूनिट –  National Toxicology Program नें अपनी कैंसर रिपोर्ट में सैकरीन को कैंसर पैदा करने वाला केमिकल मान लिया, और आदेश दिया गया कि सैकरीन से युक्त किसी भी खाद्य पदार्थ में निम्न वार्निग भी छापी जानी आवश्यक है –

सैकरीन कॉज कैंसर

Image Source: https://goo.gl/fXvkHv

कईं दशको तक जहर खिलाने के बाद – इस प्रकार की वार्निंग इत्यादि से मानवता का कितना भला होता है – यह तो अपने आप में एक अनुसंधान का विषय है – किन्तु जहाँ तक मुझे याद है भारत में मैंने इस प्रकार की कोई वार्निंग इत्यादि भी कभी किसी सैकरीन पदार्थ के ऊपर नहीं देखी | 1989 में भी मेरे father, जो खुद डायबिटीज से ग्रस्त थे, सैकरीन की गोलियां चाय इत्यादि में डाल कर पीते थे, जिन पर इस प्रकार का कोई वार्निंग लेबल नहीं था|

अमेरिका जैसे देशों में वर्ष 2000 तक इस प्रकार की वार्निंग सैकरीन पदार्थो के ऊपर छापी जाते रही – किन्तु December 21, 2000 को वैज्ञानिक इतिहास में एक और चमत्कार हुआ – लगभग २० वर्षों तक उक्त वार्निग सैकरीन पदार्थो पर छापने के बाद, यह वार्निंग भी सैकरीन पदार्थो से हटा ली गयी और अमेरिका के National Toxicology Program नें कैंसर पैदा करने वाले chemicals की लिस्ट से सैकरीन को हटा दिया ! see (7)

कारण दिया गया – कि सैकरीन सिर्फ चूहों में कैंसर पैदा करती है – आदमियों में नहीं ! इस पालिसी परिवर्तन के साथ ही सैकरीन फिर से विश्व भर में लाखों करोडो इंसानों द्वारा बेरोकटोक प्रयोग की जाने लगी|

यहाँ यह तथ्य उल्लेखनीय है कि October 31, 1997 को  अमेरिका के National Institute of Environmental Health Sciences (NIEHS) की यूनिट ‘National Toxicology Program’ के वैज्ञानिक सलाहकारों के बोर्ड (Board of Scientific Counselors) नें सैकरीन को कैंसर पैदा करने वाले पदार्थो की सूची से न निकालने के पक्ष में वोट किया था (8) इसके बावजूद  इसको वर्ष 2000 में इस लिस्ट से निकाल दिया गया !

जिस कंपनी के cheerleader – Hillary Clinton and Bill Gates जैसे celebrity हो, (9) उसके लिए कोई जो भी कर दे वह  कम है !

अमेरिका भी मानता है कि सैकरीन से कैंसर नहीं होता है किन्तु सैकरीन से कैंसर होता है – इस पर अभी भी देश विदेशों से वैज्ञानिक लेख छपते रहते हैं| (10)(11) जिन पर कोई ध्यान क्यों नहीं देता – यह भी अपने आप में एक खोज का विषय है!

अमेरिका जो करे सो करे – किन्तु भारत नें Monsanto जैसी कंपनी से उपजे जहर सैकरीन से अपने नागरिकों को बचाने के लिए क्या किया?

भारत ने किया सिर्फ एक सर्वेक्षण – वो भी वर्ष 2006 में| स्टडी का टाइटल था – Usage of saccharin in food products and its intake by the population of Lucknow, India. अर्थात लखनऊ शहर में लोग कितनी सैकरीन खा जाते है सिर्फ इस बात का सर्वेक्षण किया गया और निष्कर्ष में बताया गया की हाँ, खाते हैं और जो खाते हैं उनको कैंसर हो सकता है!

– “Thus, individuals in the maximum consumption group for pan masala or pan may be susceptible to toxic effects of saccharin, including bladder distention, elevated urine osmolality and bladder cancer.” (12)

इसके अलावा ना तो भारत की अग्रणी प्रयोगशालाओं ने कभी सैकरीन जैसे जहर पर कोई एडवांस स्टडी करने का प्रयास किया (see  (13)और ना ही भारत की किसी फ़ूड नियंत्रण करने वाली किसी अथॉरिटी नें इस दिशा में कोई चिंता ही व्यक्त की! इसके विपरीत भारत की FSSAI नें तो सैकरीन को फ़ूड आइटम्स में मिलाने की लीगल परमिशन ही दे रखी है (14)

हाँ, कुछ कोर्ट केस जरुर मिले हैं जहाँ सैकरीन मिले फ़ूड के ऊपर 1990 के दौर में जजमेंट दिए गए हैं (15) और कुछ blogs एवं News papers भी इस विषय पर कभी कभी दहाड़ते रहते हैं (16)(17)(18) किन्तु अमेरिका के शेरों की दहाड़ के सामने कभी किसी की चलती है भला? उन्होंने कह दिया की सैकरीन सेफ है, तो बस है…!

NutraSweet® and Equal®

Source: https://goo.gl/qoU9mj

बात चल रही थी – भारत के गरीबों को भरपेट खाना प्रदान करवाने का दावा करने वाली कंपनी Monsanto की! बात चल रही थी, कि किस प्रकार Monsanto की शुरुवात ही 1901 में सैकरीन जैसे संदेहास्पद केमिकल से हुयी – जो पहले तो  अस्सी सालों तक जनता को खिलाया गया – फिर बीस वर्षों तक वार्निंग दे देकर खिलाया गया और बाद में वह वार्निंग भी वर्ष 2000 में हटा ली गयी| इस पूरे खेल में जीत विज्ञान की हुयी, या अमीर कॉर्पोरेटस की, यह तो अभी भी अनुसंधान का विषय है, किन्तु इस सैकड़ो वर्षो से चल रहे खेल में भारत या तो मूकदर्शक बना रहा, या अमेरिका का पिछलग्गू ! ना तो इस दिशा में भारत के वैज्ञानिको ने अपने आप कुछ सच्चाई जानने का प्रयास किया, और ना भारत की खाद्य पदार्थो को रेगुलेट करने वाली संस्थाओं ने….

इसी बीच जब वर्ष 1981 में अमेरिका के National Institute of Environmental Health Sciences (NIEHS) की यूनिट –  National Toxicology Program नें अपनी कैंसर रिपोर्ट में सैकरीन को कैंसर पैदा करने वाला केमिकल मान लिया था और आदेश दिया था  कि सैकरीन से युक्त किसी भी खाद्य पदार्थ में वार्निग भी छापी जानी आवश्यक है – अमेरिका के बाजार अपने एक नए कृत्रिम स्वीटनर ‘Aspartame‘ के साथ तैयार थे!

Aspartame को अमेरिका के FDA नें वर्ष 1981 में बिना किसी हील-हुज्जत के approval दे दिया| NutraSweet® and Equal® के नामों से Aspartame को विश्व के बाजारों में बेचा जाने लगा| इस उत्पाद का पेटेंट था अमेरिका की कंपनी G.D. Searle के नाम| वर्ष 1985 में Monsanto नें G.D. Searle को खरीद लिया| यह वह समय था जब कोका-कोला जैसी कंपनियों ने भी सैकरीन को छोड़ कर Monsanto के Aspartame  को अपनी पेप्सी कोक इत्यादि में मिलाना शुरू कर दिया!

पेप्सी कोक एसपारटेम

Image: Diet Coke was sweetened with aspartame. Image Source: https://goo.gl/Qbbvv8

Aspartame को FDA approval मिलने के समय ही वैज्ञानिको नें बता दिया था कि Aspartame भी एक बेहद खरतनाक किस्म का brain tumour पैदा कर देता है और दिमाग में छेद कर देता है – किन्तु उन वैज्ञानिको की किसी ने एक ना सुनी! Monsanto का विजय रथ चलता रहा – आगे बढता रहा !

Aspartame एवं इस जैसे ही Monsanto के दर्जनों chemicals से लेकर GM Mustard तक की कहानी अगले भाग में……!

क्रमशः…………..

GM Mustard, ईस्ट-इंडिया कम्पनियाँ एवं काठ के घोड़ों की फ़ौज – भाग 3 में पढ़िए आगे की कहानी……भाग दो  पर आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा…..

डॉ सुनील कुमार वर्मा (डी. फिल. यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफ़ोर्ड)

Saccharin of Monsato - Vigyaan

बात चल रही थी, कि किस प्रकार Monsanto की शुरुवात ही 1901 में सैकरीन जैसे संदेहास्पद केमिकल से हुयी – जो पहले तो  अस्सी सालों तक जनता को खिलाया गया – फिर बीस वर्षों तक वार्निंग दे देकर खिलाया गया और बाद में वह वार्निंग भी वर्ष 2000 में हटा ली गयी| इस पूरे खेल में जीत विज्ञान की हुयी, या अमीर कॉर्पोरेटस की, यह तो अभी भी अनुसंधान का विषय है, किन्तु इस सैकड़ो वर्षो से चल रहे खेल में भारत या तो मूकदर्शक बना रहा, या अमेरिका का पिछलग्गू ! ना तो इस दिशा में भारत के वैज्ञानिको ने अपने आप कुछ सच्चाई जानने का प्रयास किया, और ना भारत की खाद्य पदार्थो को रेगुलेट करने वाली संस्थाओं ने….…क्रमशः

Bibliography and Notes

1.
Monsanto’s Dark History: 1901-2011 (http://bestmeal.info/monsanto/company-history.shtml). Accessed on – 20/06/2017.
2.
Monsanto, a Contemporary East India Company, and Corporate Knowledge in India. https://goo.gl/4AVtUh. Accessed on – 20/06/2017.
3.
Nigerians boycott Coca-Cola drinks after court rules them “poisonous”. http://edition.cnn.com/2017/03/28/africa/nigeria-coca-cola-case/index.html. Accessed on – 20/06/2017.
4.
Coca-Cola’s products Sprite and Fanta may be “poisonous”, rules Nigeria Court. https://goo.gl/V8FxWo. Accessed on – 20/06/2017.
5.
Hicks R, Wakefield J, Chowaniec J. Letter: Co-carcinogenic action of saccharin in the chemical induction of bladder cancer. Nature. 1973 Jun 8; 243: 347–9. [PubMed]
6.
Carcinogenicity of saccharin. Environ Health Perspect. 1978 Aug; 25: 173–200. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC1637197/.
7.
8.
Bell W, Clapp R, Davis D, Epstein S, Farber E, Fox D, et al. Carcinogenicity of saccharin in laboratory animals and humans: letter to Dr. Harry Conacher of Health Canada. Int J Occup Environ Health. 2002 Oct 1; 8: 387–93. [PubMed]
9.
see – https://goo.gl/EPZfoM. Link accessed on 21/06/2017.
10.
Alkafafy M-S, Ibrahim Z, Ahmed M, El-Shazly S. Impact of aspartame and saccharin on the rat liver: Biochemical, molecular, and histological approach. Int J Immunopathol Pharmacol. 2015 Jun 1; 28: 247–55. [PubMed]
11.
van E. The effect of five artificial sweeteners on Caco-2, HT-29 and HEK-293 cells. Drug Chem Toxicol. 2015 Jan 1; 38: 318–27. [PubMed]
12.
Tripathi M, Khanna S, Das M. Usage of saccharin in food products and its intake by the population of Lucknow, India. Food Addit Contam. 2006 Dec 1; 23: 1265–75. [PubMed]
13.
see these results from NCBI – https://goo.gl/LYFuoK. Accessed on 21/06/2017.
14.
Artificial Sweeteners: What does FSSAI say? http://foodsafetyhelpline.com/2015/05/artificial-sweeteners-what-does-fssai-say/. Accessed on 21/06/2017.
15.
see – K. Krishna Iyer vs State Of Kerala And Anr on 30 March, 1993. https://indiankanoon.org/doc/622631/. Accessed on – 21/06/2017.
16.
Are Artificial Sweeteners Really That Bad for You? http://content.time.com/time/health/article/0,8599,1931116,00.html. Accessed on 21/06/2017.
17.
Can Sugar Substitutes Make You Fat? http://content.time.com/time/health/article/0,8599,1711763,00.html. Accessed on 21/06/2017.
18.
Artificial Sweeteners: The Silent Killer. http://www.india.com/food-2/artificial-sweeteners-the-silent-killer-560418/. Accessed on 21/06/2017.

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About the Author ()

Dr Sunil Kumar Verma is an experienced Principal Scientist with a demonstrated history of working in the research industry for more than 20 years. Skilled in Molecular Medicine, Genetics, Translational Research and Wildlife Forensics, Dr Verma has done his doctorate from the University of Oxford. UK. He had been the inventor of 'Universal Primer Technology' (US Patent 7141364), which led to the establishment of India's first wildlife forensics cell in the LaCONES of CCMB to provide wildlife forensics services to the nation. He is also the recipient of several national and international awards and honours, including the 2008 CSIR Technology Award, the 2009 NRDC Meritorious Invention Award of Govt. of India and the 2009 BioAsia Innovation Award in recognition of his contribution to Indian science and technology.

Comments (4)

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  1. कौशल says:

    अनुकरणीय कार्य । इस तरह के आलेखों की निरंतरता बनाये रखने के लिये अनुरोध है । शायद नयी पीढ़ी कुछ ध्यान दे … वरना हम हिन्दुस्तानी हर फ़िक्र को धुएं में उड़ा कर चलने वाले हैं …भले ही फिर कैंसर क्यो न हो जाय और उसके कारण घर-खेत भी क्यों न बिक जाएं । बस यही हमारी ख़ासियत है । किंतु ताअज़्ज़ुब तो यह है कि पश्चिमी देशों में भी इतनी जागरूकता नहीं दिखती । टैमी फ़्लू का किस्सा आप भी जान ही रहे हैं।

  2. नागेन्द्र सिंह says:

    आँखे खोलने वाला लेख जनता की भाषा में। सैकरिन और स्पारटेम बहुत समय से कान्ट्रोवरसी में रहे है । मुझे याद है कि क़रीब ३० वर्ष पहले जब मैं आष्ट्रेलिया में था तब भी ये दोनों स्वीट्नरस चर्चा में थे । ईस तरह के और भी फ़ूड ग्रिजरवेटिव और रंग है जो लगातार चर्चा में रहे हैं, इसके बावजूद भी इनका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है । ऐसी क्या मजबूरी है ? क्या ये अल्कोहल और निकोटिन की तरह addictive हैं या प्रासेसड फ़ूड इन्डस्ट्री की मजबूरी ?

    • आदरणीय सर,

      इनको बनाने वाली कंपनियां इनको फेज आउट होने ही नहीं देती – जैसे कि लेख में लिखा है कि 80 साल तक Monsanto नें इसे खूब खिलाया – फिर बीस साल वार्निंग लिख कर खिलाया – और फिर वो वार्निंग भी हटवा दी – लैब की लैब खरीद ली जाती है – प्राइवेट फंडेड रिसर्च, फण्ड को जस्टिफाई करवाते हैं – उल्टा सीधा पेपर आ जाता है – जर्नल भी इनके – एडिटर भी इनके – ऑथर भी इनके! उन्ही पेपरों को regulatory बॉडीज को दिखा कर क्लीयरेंस ले लिया जाता है | मार्किट में माल बिकता रहता है |

      पब्लिक का क्या – उनको तो FDA बोले कि टट्टी भी स्वास्थ्य के लिए ठीक होती है, तो वो टट्टी भी खा ले !

      मल / विष्ठा (stool/fecal material) से बीमारियों का इलाज़

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