GM Mustard, ईस्ट-इंडिया कम्पनियाँ एवं काठ के घोड़ों की फ़ौज - भाग 3
GMO Emperors: The father of sick planet!

| June 22, 2017 | 5 Comments

अभी तक ‘GM Mustard, ईस्ट-इंडिया कम्पनियाँ एवं काठ के घोड़ों की फ़ौज’ लेख श्रंखला के दो लेख ((भाग १, भाग २) आ चुके हैं | इन दोनों लेखों को देश ने बहुत गहनता से पढ़ा है, Discuss किया है, criticize तो कम ही किया है – किन्तु एक कमेंट कई बार आया है –

“Vishnu Kumar अभी तक के दो भाग पढ़े जिसमे GM छोड़कर बाकी सबकुछ लिखा है। शीर्षक के संदर्भ में कुछ तथ्य लिखने चाहिए।”

“Kanhaiya Srivastava डॉ श्री सुनील वर्मा What is going to appear on GM crop, I would love to read.”

मैंने हर बार सभी पाठको को बहुत नम्रता से सिर्फ एक जवाब दिया है –

GM तक तथ्यपूर्ण तरीके से आने के लिए उस कंपनी का करेक्टर और नीयत जान लेना आवश्यक है जो GM लेकर आयी है – इसलिए यह श्रंखला जरुरी है – पढ़ते रहिये और आनंद लीजिये”

before I say anything about GM, I must tell the character the of company who brought GM in the world! Otherwise, my articles will also be like the articles of hundreds of others, who just talk without depth!!!”

कट्टप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा – यह जानने के लिये आप सब नें पांच छः साल इंतज़ार किया – और छः सात घंटे तक एकाग्रता के साथ डिम लाइट में बैठ कर, पैसे दे कर, थिएटर के निर्जीव रुपहले परदे को निहारा; मुझे पता है | इसलिए मुझे विश्वाश है कि GM mustard जैसे गंभीर विषय को भी आप उसी एकाग्रता से समझने का प्रयास करेंगे…..

इस श्रंखला का भाग 3 — GMO Emperors: The father of sick planet!

बात चल रही थी सैकरीन की –

1981 में (लगभग 80 वर्षों तक इंसानों को बेलगाम सैकरीन खिलाने के बाद) अमेरिका के National Institute of Environmental Health Sciences (NIEHS) की यूनिट –  National Toxicology Program नें अपनी कैंसर रिपोर्ट में सैकरीन को कैंसर पैदा करने वाला केमिकल मान लिया, और आदेश दिया गया कि सैकरीन से युक्त किसी भी खाद्य पदार्थ में निम्न वार्निग भी छापी जानी आवश्यक है –

सैकरीन कॉज कैंसर

Image Source: https://goo.gl/fXvkHv

इस वार्निंग के कारन सैकरीन का बाजार थोडा ठंडा हो चुका था | जहर के सौदागरों को शायद इसका आभास कुछ पहले ही हो गया था इसीलिए उन्होंने इसका विकल्प खोजना काफी पहले शुरू कर दिया होगा |

इसी दौरान सन 1965 में ही अमेरिका की ही एक दूसरी कंपनी G. D. Searle नें एक दुसरे molecule की खोज की जो सैकरीन की तरह ही चीनी से 180 गुना मीठा था | इस मॉलिक्यूल का नाम G. D. Searle ने रखा Aspartame (1)

G. D. Searle ने इस मॉलिक्यूल में बड़ा व्यापार देखा और इसके FDA अप्रूवल के लिए प्रयास शुरू कर दिए |

1967 में University of Wisconsin में Aspartame  के परीक्षण – सात बंदरों के बच्चों पर किये गए | उनको दूध में मिला कर Aspartame दिया गया | परीक्षण के  परिणाम स्वरुप सात में से एक बन्दर की मृत्यु हो गयी, और पांच बंदरों को दौरे (seizures) पड़ने शुरू हो गए |

इसी दौरान एक Neuroscientist Dr. John Olney नें अपने अध्ययन में पाया कि aspartic acid (जो कि Aspartame का एक ingredient था) चूहों के दिमाग में छेद कर देता है | इन परीक्षणों को दूसरे वैज्ञानिकों ने भी सही पाया |

G. D. Searle अब तक Aspartame के ऊपर परीक्षणों में करोडो डॉलर खर्च कर चुकी थी| किन्तु परीक्षण सही मायनों में फ़ैल हो चुके थे |

इसके बावजूद भी G. D. Searle नें 1973 में Aspartame  के अप्रूवल के लिए FDA में अप्लाई कर दिया | एक महीने बाद ही FDA नें उनकी एप्लीकेशन को रिजेक्ट कर दिया |

किन्तु जुलाई 1976 को पता नहीं क्या जादू हुआ – कि FDA नें G. D. Searle के एसपारटेम को ड्राई फूड्स में प्रयोग करने की अनुमति दे दी |

FDA के इस निर्णय के खिलाफ Neuroscientist Dr. John Olney एवं उनके सहयोगियों ने मोर्चा खोला, और इन्वेस्टीगेशन शुरू हो गए |  बाद में वर्ष 1977 में FDA को भी लगने लगा कि उससे कही कुछ गलती हो गयी थी, क्योकि G. D. Searle नें गलत डाटा दिखाकर उनसे अप्रूवल ले लिए था |

इसकी जांच की जिम्मेदारी ‘U.S. Attorney’s office’ को दी गयी | इस जांच का in charge था U.S. Attorney का Samuel Skinner नाम का अधिकारी |

G. D. Searle ने इस अधिकारी को भी अपने में मिला लिया  – और July 1, 1977 को Samuel Skinner नें U.S. Attorney’s office को छोड़ कर Searle की Law firm में नौकरी ज्वाइन कर ली |

इसका परिणाम यह हुआ कि केस लम्बा खिंच गया, और statue of limitations के तहत aspartame के ऊपर charges की मियाद ख़त्म हो गयी |

जनवरी 1981 में Ronald Reagan अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए | उस वक्त G. D. Searle के सीईओ Donald Rumsfeld  – Ronald Reagan के खास आदमियों में से थे |

Donald Rumsfeld नें Dr. Arthur Hull Hayes Jr. को FDA का नया Commissioner बनवा दिया |

1981 में FDA का Commissioner बनते ही Dr. Arthur Hull Hayes Jr. ने सबसे पहला काम किया G.D. Searle के Aspartame (NutraSweet) को फुल अप्रूवल देने का |

सभी वैज्ञानिक परीक्षणों /परिणामों को दरकिनार करके एसपारटेम को जुलाई 1981 में FDA अप्रूवल दे दिया गया | एसपारटेम को फिर से ड्राई फूड्स में मिलाने की अनुमति दे दी गयी |

October 15, 1982 को Searle नें एसपारटेम को carbonated beverages (कॉक, पेप्सी इत्यादि) एवं अन्य liquids में मिलाने की परमिशन भी मांगी |

उल्लेखनीय है कि carbonated beverages (कॉक, पेप्सी इत्यादि) एवं अन्य liquids में मिला हुआ एसपारटेम, 29 degree Celsius तापमान पर DKP एवं formaldehyde नामक रसायनों में टूट जाता है और ये दोनों ही रसायन बेहद खतरनाक किस्म के रसायन हैं |

इसी आधर पर अमेरिका की कई संस्थाओं ने Aspartame को carbonated beverages  एवं अन्य liquids में मिलाने का विरोध किया, किन्तु FDA के नए बॉस के सामने किसी की एक ना चली |

1983 तक कई सारे बड़े लेवल के खेल खेलने के बाद G. D. Searle नें एसपारटेम को carbonated beverages  एवं अन्य liquids में मिलाने की परमिशन भी ले ली !

वर्ष 1985 में Monsanto नें $2.7 billion में G. D. Searle को उसके एसपारटेम के साथ खरीद लिया | और G. D. Searle – Monsanto की wholly owned subsidiary बन गयी |

पूरे अमेरिका नें डाइट कॉक में मिला हुआ जहर एसपारटेम बड़े चाव से पिया और आज भी पी रहा है | कुछ साल पहले तक डाइट कॉक भारत में नहीं मिलता था, किन्तु अब भारत में भी यह धड़ल्ले से बिक रहा है और हेल्थ conscious भारतीय, Diet कॉक में मिले Aspartame को चुस्की ले लेकर पी रहे हैं |

Aspartame brain कैंसर पैदा करता है – इसकी पुष्टी बाद में भी बहुत सारे वैज्ञानिक अध्ययनों में होती रहती है, किन्तु अमेरिका की FDA, National Cancer Institute (NCI) जैसी संस्थाओ के निर्णय के सामने किसी की नहीं चलती!

भारत के FSSAI नें तो निर्विरोध Aspartame को लगभग सभी खाद्य पदार्थों में मिलाने की अनुमति जारी कर रखी है – जो निम्न प्रकार है: (2)

Aspartame (methylester)

Carbonated Water 700 ppm
Soft Drink concentrate *700 ppm
Biscuits, Bread, Cakes and Pasteries 2200 ppm
Sweets (Carbohydrates based and Milk products based) :
Halwa, Mysore Pak, Boondi Ladoo, Jalebi, Khoya Burfi, Peda, Gulab Jamun, Rasogolla and similar milk product based sweets sold by any name 200 ppm
Jam, Jellies, Marmalades 1000 ppm
Chocolate (White, Milk, Plain, Composite And Filled) 2000 ppm
Sugar based/ Sugar free confectionery 10000 ppm
Chewing gum/ Bubble gum 10000 ppm
Synthetic Syrup for dispenser 3000 ppm
Custard powder mix 1000 ppm
Vegetarian jelly crystals 3000 ppm
Fruit Nectar 600 ppm
Vegetable Nectar 600 ppm
Ice Cream, Frozen Dessert and Pudding 1000 ppm
Flavoured Milk 600 ppm
Ready to Serve Tea and Coffee based Beverages 600 ppm
Yoghurt 600 ppm
Ready to eat Cereals 1000 ppm
Non-Carbonated water based beverages (non-alcoholic) 600 ppm

तो पहले G. D. Searle  और अब Monsanto  का प्यारा Aspartame बड़े आराम से भारत की 80 करोड़ जनता (जो 35 वर्ष से कम नौजवान हैं) के दिमाग में कैंसर एवं होल (छेद) पैदा करने में लगा हुआ है | इसके नए नए सप्लायर भारत में आ चुके हैं, और लगातार एसपारटेम को विभिन्न खाद्य पदार्थो, हेल्थ ड्रिंक एवं दवाइयों तक में मिला कर हमारे शरीर में रोज काफी मात्रा में घुसा रहे हैं |

Food products with Aspartame

Health Drinks with Aspartame

Pharma Products with Aspartame

Beverages with Aspartame

Images from http://aspartameindia.com/. Copyright: http://aspartameindia.com/

कोका कोला इंडिया की वेबसाइट पर मैंने पढ़ा – कि:

Aspartame contains phenylalanine and should not be consumed by people with a rare genetic disorder called phenylketonuria (PKU). The regulations of most countries require that food and beverage products that contain aspartame carry a statement on the label alerting people with this condition to the presence of phenylalanine.”

मतलब जिन लोगों को phenylketonuria नाम की बीमारी होती है उनको  ‘Aspartame’ बिलकुल भी नहीं खाना या पीना चाहिए |इसके लिए कुछ देशो ने यह प्रावधान भी बना रखा है कि ‘Aspartame’ मिले खाद्य पदार्थ या हेल्थ ड्रिंक इत्यादि साफ़ साफ़ लेबल पर लिखे कि इस उत्पाद में Aspartame मिला है ताकि ‘Phenylketonuria’ से ग्रसित लोग इसे न खाए या पीये |

Phenylketonuria एक प्रकार की अनुवांशिक बीमारी है – जिसमें पैदा होते ही बच्चो में complications जैसे heart problems, small head, low birth weight इत्यादी हो जाते हैं | इस बीमारी के कारण दिमाग के न्यूरॉन तेजी से मरते हैं, जिसके कारण बाद में intellectual disability, seizures, behavioral problems, एवं  mental disorders हो जाते हैं | यह बीमारी जीवन पर्यंत रहती है| (3)

इस बीमारी का पता, पैदा होते ही बच्चे की मेडीकल स्क्रीनिंग जिसको ‘Newborn Screening‘ कहा जाता है, में चल जाता है | अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशो में Newborn Screening जरुरी है, किन्तु भारत में Newborn Screening ना तो mandatory है और ना ही भारत के अस्पतालों में इसकी सुविधा ही है|

तो भारत में कितने लोग ‘Phenylketonuria’ से ग्रसित हैं, इसका कुछ अता पता नहीं है ! और जब इस बात का पता ही नहीं, कि किसको  ‘Phenylketonuria’ है  और किसको नहीं, तो यहाँ तो सब बड़े मजे से पेप्सी कोक इत्यादी मिला ‘Aspartame’ गले से नीचे उतारे जा रहें हैं बस…..!

मैंने तो भारत में आज तक किसी Coke, Pepsi के लेबल पर लिखा नहीं देखा – कि इसमें एसपारटेम है, ‘Phenylketonuria’  से ग्रसित लोग इसे ना पिए! शायद ऐसा कोई regulation देश में है ही नहीं!!

अब सवाल उठता है – कि क्यों नहीं है? क्या देश की regulatory अथॉरिटी को पता नहीं कि ‘Aspartame’ – ‘Phenylketonuria’  के मरीजों का जानी दुश्मन हैं!

क्यों देश के वैज्ञानिक चुप हैं, और क्यों नहीं वें इन तथ्यों पर विचार करके अपनी संस्तुति सरकार को देते हैं?

अमेरिका जैसे देश तो ठन्डे देश हैं, किन्तु भारत तो एक गरम जलवायु वाला देश है | जब पता है कि ‘Aspartame’ मात्र 29 डिग्री Celsius पर DKP एवं formaldehyde नामक रसायनों में टूट जाता है और ये दोनों ही रसायन बेहद खतरनाक किस्म के जहर हैं, तो क्यों एसपारटेम को इस देश में परमिशन देते समय इस प्रकार के तथ्यों पर विचार नहीं किया जाता ? क्यों हम अंधे होकर वो सब करते रहते हैं जो अमेरिका करता है, या अमेरिका करवाना चाहता है?

भारत में तो कॉक पेप्सी के कैन ऐसे ही धुंप में रखे रहते है| बेचने से एक आध घंटे पहले बनिया उनको फ्रिज में रख देता है| तो क्या उसमें मिला ‘Aspartame’ उस गर्मी में DKP एवं formaldehyde में नहीं टूटता होगा?

Formaldehyde – मुर्दों को सुरक्षित रखने के काम आता है -स्कूल की बायोलॉजी की लैब में मरे हुए मेढक और झींगे इत्यादि इसी रसायन में डूबा कर रखे जाते है, जिसमें गिरते ही वो अकड कर पत्थर बन जाते हैं, और कई कई साल तक ऐसे ही पड़े रहते हैं |

आप सोच कर देखिये कि जब स्वादिष्ट हेल्थ ड्रिंक, beverage, Coke, पेप्सी, फ्लेवर्ड मिल्क इत्यादी के साथ यह ‘Formaldehyde’ हमारे शरीर में जाता होगा, तो क्या-क्या गुल खिलाता होगा!

यह तो समझ में आता है कि अमेरिका की अंदरुनी राजनीति के कारण अमेरिका में इस रसायन को, जो कि साफ़-साफ़ एक कैंसर पैदा करने वाला एवं दिमाग में होल करने वाला रसायन सिद्ध हो गया था, अप्रूवल मिल गया, किन्तु भारत की ऐसी क्या मजबूरी थी, कि हमने आँख बंद करके इसे देश में निर्विरोध approve कर दिया?

मुझे पता है कि लेख को यहाँ तक पढ़ते पढ़ते आपकी रूह तक कांप रही है!

सैकरीन एवं एसपारटेम तो बस दो रसायन हैं….

ऐसे-ऐसे तो और भी कई सारे chemicals हैं, जिनको Monsanto बड़े प्यार से आपको खिला रहा है, रोज खिला रहा है |

इस कतार में है – GM Mustard – जिसमे चर्चा अगले लेख में…….

क्रमशः…………..

GM Mustard, ईस्ट-इंडिया कम्पनियाँ एवं काठ के घोड़ों की फ़ौज – भाग 4 में पढ़िए आगे की कहानी……भाग तीन  पर आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा…..

डॉ सुनील कुमार वर्मा (डी. फिल. यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफ़ोर्ड)

GM Mustard, ईस्ट-इंडिया कम्पनियाँ एवं काठ के घोड़ों की फ़ौज - भाग 3 - Aspartame

GM Mustard, ईस्ट-इंडिया कम्पनियाँ एवं काठ के घोड़ों की फ़ौज – भाग 3 – Aspartame

अमेरिका जैसे देश तो ठन्डे देश हैं, किन्तु भारत तो एक गरम जलवायु वाला देश है | जब पता है कि ‘Aspartame’ मात्र 29 डिग्री Celsius पर DKP एवं formaldehyde नामक रसायनों में टूट जाता है और ये दोनों ही रसायन बेहद खतरनाक किस्म के रसायन हैं, तो क्यों एसपारटेम जैसे रसायन को इस देश में परमिशन देते समय इस प्रकार के तथ्यों पर विचार नहीं किया जाता ? क्यों हम अंधे होकर वो सब करते रहते हैं जो अमेरिका करता है, या अमेरिका करवाना चाहता है?

 

Social Corner



Bibliography and Notes

1.
How Aspartame Became Legal – The Timeline. http://www.rense.com/general33/legal.htm. Accessed on – 25/06/2017.
2.
FOOD SAFETY AND STANDARDS (FOOD PRODUCTS STANDARDS AND FOOD ADDITIVES) REGULATIONS, 2011. https://goo.gl/Bn4mfH. Accessed on – 25/06/2017.
3.
Joshua G, Chandy S, Radhakrishnan A, Mammen D, Mathai K. Phenylketonuria in Indian children. J Inherit Metab Dis. 1978 Jan 1; 1: 67–70. [PubMed]

Tags: , , , , ,

blank

About the Author ()

Dr Sunil Kumar Verma is an experienced Principal Scientist with a demonstrated history of working in the research industry for more than 20 years. Skilled in Molecular Medicine, Genetics, Translational Research and Wildlife Forensics, Dr Verma has done his doctorate from the University of Oxford. UK.

He had been the inventor of ‘Universal Primer Technology’ (US Patent 7141364), which led to the establishment of India’s first wildlife forensics cell in the LaCONES of CCMB to provide wildlife forensics services to the nation.

He is also the recipient of several national and international awards and honours, including the 2008 CSIR Technology Award, the 2009 NRDC Meritorious Invention Award of Govt. of India and the 2009 BioAsia Innovation Award in recognition of his contribution to Indian science and technology.

Comments (5)

Trackback URL | Comments RSS Feed

  1. राजेश कंचन says:

    अद्भुत जानकरी

  2. नागेन्द्र सिंह says:

    ईस ज़हर को डाइबेटिक और मोटापे से ग्रसित लोग विशेष रूप से पी रहे है। इसलिये कि शक्कर उनके लिये और भी बड़ा ज़हर है, और मीठा खाने की ललक जाती नहीं । क्या ऐसे स्वीटनरस की एक सूची है जो परीक्षण के बाद सुरक्षित पाये गये हों, उन्हें प्रोमोट किया जाय । स्टीविया, थाउमिटीन आदि पर कितनी टेस्टिंग हुई है? क्या यें सुरक्षित हैं ? नैचुरल प्रोडक्ट के नाम पर भी कम ठगी नहीं है इस देश में। बेस्ट है कि यदि सूगर वर्जित है तो मीठे की लालच छोड़े और यह समझ लें कि आप के जीवन में मिठाई का कोटा ख़त्म हो गया है। 😁😁

    • सर,

      Stevia extract is typically about 200 times sweeter than sugar. When it comes to using Stevia, you only need a tiny bit at a time to sweeten your morning tea or next batch of healthy baked goods. So Stevia side effects are typically not common, especially if you choose the right Stevia product. I will write separate article about it. Though Stevia is an American plant, but America never popularized it…….!!

      The work, done with mice and humans, suggests that artificial sweeteners saccharin (a.k.a. Sweet‘N Low), sucralose (a.k.a. Splenda) and aspartame (a.k.a. NutraSweet and Equal) could raise your blood sugar levels more than if you indulged in eating real suger.

      बिल मलिंडा गेट्स और Monsanto की बताई हुयी रिसर्च को बंद करके ‘अपने’ देश के पैसों से अपने हिसाब की रिसर्च करनी होगी— तब काम बनेगा—नहीं तो ऐसे ही चलेगा…..सर….स्टेविया पर रिसर्च करने में कितना टाइम लगेगा – पांच साल!! पांच करोड़…..बस ना…….मुझे लगता है इतना तो देश अफ्फोर्ड कर सकता है बिना बिल गेट्स की हेल्प के भी……

      और अंत में –

      डॉ Nagendra Singh सर नें यह विडियो भेजा है –

      डॉ सुनील कुमार वर्मा

  3. Prashant Rana says:

    When u will write on GMO

  4. Prashant rana says:

    सर आपने अब तक अदभुत लिखा है। आपका भाग-4 कब आयेगा। उसका बेसब्री से इंतज़ार है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *