Peer Reviewed Article
मल / विष्ठा (stool/fecal material) से बीमारियों का इलाज़

| May 10, 2017 | 0 Comments

प्रथम बार सुनने में यह अटपटा सा लगता है ! मल/ विष्ठा जैसी गंदी चीज से भी भला किसी बीमारी का इलाज हो सकता है ! सुनने में यह भले ही अटपटा सा लगे, किन्तु यह सत्य है कि मल (stool/fecal material) से सिर्फ इलाज ही नहीं, लाइलाज बीमारियों का इलाज़ भी संभव है |

क्या है मल चिकित्सा (Fecal microbiota transplant, FMT)

आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि मानव की आंत में लगभग 100 trillion लाभदायक जीवाणु निवास करते है | यें जीवाणु कोई बीमारी नहीं फैलाते वरन मनुष्य की बीमारियों से बचने में सहायता ही करते हैं | यहाँ तक, कि यें जीवाणु मनुष्य की इम्युनिटी विकास तक में अपना योगदान देते हैं, और विभिन्न प्रकार के बीमारी उत्पन्न करने वाले अन्य जीवाणुओं से भी लगातार लड़ते रहते हैं और उनको मार गिराते हैं | (1)

वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि आँतों में पाए जाने वाले जीवाणुओं में अंतर होने पर ना केवल शारीरिक वरन मानसिक स्वास्थ्य और स्वभाव भी बदल सकता है, अतः विष्ठा में पाए जाने वाले जीवाणुओं का सही संतुलन बनाए रखना अति आवश्यक है | (2)

इस प्रकार यें जीवाणु मानव जीवन का अभिन्न अंग हैं और मानव की आंत में रहकर लगातार विभिन्न जैविक क्रियाओं में योगदान देते हैं|

वैज्ञानिक शब्दावली में आंत में रहने वाले इन जीवाणुओं को Gut flora, या gut microbiota कहा जाता है | मनुष्य के सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए इस गट माइक्रोबायोटा का एक सु-नियंत्रित संतुलन में रहना अति आवश्यक है |

जब आंत में इन लाभदायक जीवाणुओं का संतुलन बिगड़ जाता है या कुछ अति लाभदायक जीवाणु किसी कारण से कम हो जाते हैं तो वातावरण में संचरित या कुछ मौक़ापरस्त – रोगाणु आंत में पहुँच कर पनपना शुरू कर देते हैं | इन बीमारी वाले जीवाणुओं के कारण विभिन्न प्रकार की बीमारियां जैसे आँतों का संक्रमण, दस्त, ज्वर, भूख-ण लगना, उदर-प्रदाह एवं मिचली इत्यादि हो जाते हैं |

कई बार तो ऐंटीबायोटिक्स के ग़लत या ज़्यादा प्रयोग से लाभदायक गट माइक्रो बायोम के संतुलन के गड़बड़ होने पर खतरनाक किस्म के जीवाणु जैसे कि Clostridium difficile इत्यादि पनपने लगते हैं | यह जीवाणु इतना खतरनाक किस्म का होता है कि कईं बार एंटीबायोटिक्स दवाओं से भी नहीं मरता |  US Centers for Disease Control and Prevention (CDC) नें बताया है कि Clostridium difficile का इन्फेक्शन होने के बाद, 65 साल से ज्यादा आयु के दस प्रतिशन लोग मात्र एक माह के अन्दर मर जाते हैं|

कहने का तात्पर्य यह है कि आँतों में उपस्थित लाभदायक जीवाणुओं का संतुलित में रहना अति आवश्यक है और अगर किसी कारणवश यह संतुलन खराब हो जाये, तो इस संतुलन का  दुबारा से ठीक होना सामान्य स्वास्थ्य के लिए अति आवश्यक हैं |

उल्लेखनीय है कि मनुष्य के मल के साथ आँतों में रहने वाले सभी प्रकार के लाभदायक जीवाणु लगातार विसर्जित होते रहते हैं | वास्तव में यही तथ्य मल चिकित्सा का आधार है |

मल चिकित्सा में किसी स्वस्थ व्यक्ति का मल लेकर, उसमें से मोटे-मोटे पार्टिकल (particulate material) विभिन्न प्रक्रियाओं  द्वारा निकालकर बीमार व्यक्ति की आँतों में प्रतिस्थापित (ट्रांसप्लांट) कर दिया जाता है |

आधुनिक नैदानिक विज्ञान में इस प्रक्रिया को (Fecal microbiota transplant, FMT) कहा जाता है | यह ट्रांसप्लांट या तो एनीमा के द्वारा directly intestine में किया जाता है,या फिर मुंह के द्वारा ही लगभग 50 ml मल का घोल रोगी को पिलाया जाता है | हाल ही में सुखाये हुए मल के कैप्सूल भी उपलब्ध हैं जिनको खाने में रोगी को असानी होती है |

इस प्रकार, स्वस्थ व्यक्ति के मल में उपस्थित लाभदायक जीवाणु फिर से बीमार व्यक्ति की आंत में पहुँच जाते हैं और वृद्धि  करनें लगते हैं | जब इन लाभदायक जीवाणुओं की संख्या एवं संतुलन फिर से सामान्य हो जाता है तो ये बीमारी उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं को फिर से मार सकने में सक्षम हो जाते हैं | और इस प्रकार व्यक्ति पुन: स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर लेता है |

कितनी कारगर है मल चिकित्सा ?

उत्तरी अमेरिका एवं यूरोप में यह चिकित्सा ज्यादा प्रचलित है | वर्ष 2013 में किये गए एक क्लिनिकल ट्रायल में यह पाया गया कि C. difficile के इन्फेक्शन के उपचार के लिए तो मलचिकित्सा एक रामबाण इलाज है | इतना ही नहीं, मल चिकित्सा अन्य रोगों जैसे colitis, कब्ज, irritable bowel syndrome के अलावा तंत्रिका तंत्र के रोगों (neurological conditions) जैसे कि  multiple sclerosis एवं पार्किन्सन (Parkinson’s disease) में भी प्रभावी पाया गया है | (3)

मल चिकित्सा का इतिहास

ऐसा माना जाता है कि चौथी सदी के चीनी साहित्य में मल चिकित्सा का वर्णन है |16 वी शताब्दी में Li Shizhen नाम के व्यक्ति ने ताजे, सूखे हुए एवं किन्वित (fermented) मल से आमाशय की अनेक बीमारियों का इलाज़ किया था | Li Shizhen  नें इस चिकित्सा को ‘yellow soup’ एवं  ‘golden syrup’ का नाम दिया | (4)

16 वी शताब्दी में ही मल चिकित्सा को जुगाली करने वाले पशुओं में प्रयोग किया गया और इसे ‘transfaunation’ का नाम दिया| यह प्रक्रिया आज भी बीमार पशुओ का इलाज करने के लिए प्रयोग की जाती है |

अरबी लोगऊंट के ताजे गोबर को खाकर पेचिस (dysentery) का सफल इलाज़ सदियों से करते आ रहे हैं | (5)(6)

हालाँकि आधुनिक नैदानिक विज्ञान में मल के चिकित्सकीय गुणों का वर्णन सर्वप्रथम 1958 में Colorado, अमेरिका के Eiseman (et. al.) नामक सर्जनो की टीम ने किया था | इन्होने pseudomembranous colitis  नामक आँतों की बीमारी का इलाज़ मल चिकित्सा से करके अनुसन्धान पत्र भी प्रकाशित किया था | (7)

इसके बाद लगातार इस क्षेत्र में अनुसन्धान पत्र प्रकाशित हो रहे है|

कई नामी संस्थानों ने मल चिकित्सा को एक उपचार की विधि के रूप में प्रयोग भी करना शुरू कर दिया है | आस्ट्रेलिया का Centre for Digestive Diseases in Sydney पिछले बीस सालों से मल चिकित्सा का प्रयोग कर रहा है |

वर्ष 2013 में Food and Drug Administration (FDA) नें भी मल को दवाई (drug) के रूप में मान्यता दे दी है | (8)

पश्चिमी देशों में, अन्य कई बीमारियों के इलाज़ के लिए क्लिनिकल ट्रायल भी लगातार किये जा रहे हैं |

यूरोप की मल चिकित्सा (Fecal microbiota transplant, FMT) एवं भारत का पंचगव्य

भारत के पुरातन आयुर्वेद विज्ञान में गाय के दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर का पानी को सामूहिक रूप को पंचगव्य (panchagavya) कहा जाता है एवं इसे औषधि की मान्यता प्राप्त है |

सहशत्राब्दियों से पंचगव्य का उपयोग विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए आयुर्वेद में किया जाता रहा है |

यह तो स्पष्ट हो रहा है कि पंचगव्य के औषधीय गुणों में गोबर इत्यादि में उपस्थित Fecal microbiota का विशेष योगदान होता होगा, किन्तु पंचगव्य पर वैज्ञानिक विधियों से अनुसंधान अभी तक नहीं हो पाए हैं|

हाल ही में Indian Institute of Technology (IIT) में एक विशाल कार्यशाला का आयोजन किया गया था, जिसमें गाय के गोबर इत्यादि से बने पंचगव्य के विभिन्न गुणों की वृहत चर्चा की गयी | यह कार्यशाला ‘उन्नत भारत अभियान’ जो कि विज्ञान एवं अनुसन्धान मंत्रालय की फ्लैगशिप योजना है, के तत्वावधान में की गयी थी |

बाद में वर्ष 2017 में भारत सरकार नें  एक अतिविशष्ट पंचगव्य अनुसन्धान प्रोग्राम की आधारशिला रखी|  इस वृहत विज्ञान अनुसन्धान योजना का नाम ‘Scientific Validation and Research on Panchgavya” (SVAROP) रखा गया है|

इस योजना के तहत ‘विज्ञान एवं अनुसन्धान मंत्रालय’ – Department of Science & Technology (DST), Department of Biotechnology (DBT) एवं Council of Scientific & Industrial Research (CSIR) तथा Indian Institute of Technology, Delhi (IITD) के साथ मिलकर भारत में पंचगव्य पर अनुसन्धान कार्य की शुरुवात करने का प्रावधान है|

इस प्रोग्राम के लिए एक National Steering Committee भी बनाई है जिसके चेयरमैन स्वम Minister of Science Technology and Earth Sciences Dr. Harsh Vardhan हैं | (9)

इस प्रोग्राम की आधारशिला रखने के साथ ही, भारत के तथाकथित बुद्धीजीवी वर्ग ने हायतौबा मचा रखी है | विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इस पहल के विरोध में भारत पर तंज़ कसे जा रहे हैं | (10)

इस प्रयास को भारत में विज्ञान का ग्रहण बताया जा रहा है |

अमेरिका से छपने वाली वैज्ञानिक पत्रिका “Science’ में भारत के एक विज्ञान पत्रकार ने तो इसको वर्तमान सरकार के ‘हिंदुत्व’ के ऐजेंडा के साथ घाल मेल कर प्रस्तुत किया है और कुछ चुने हुए तथाकथित बुद्धिजीवियों के विचारों को भी highlight किया है | (11)

कुछ विज्ञान्विदों नें इस प्रोग्राम को ‘विज्ञान का अपमान’ बताया है|

मेरी समझ में यह नहीं आता, कि मल (fecal material) के औषधीय गुणों की उपरोक्त वैज्ञानिक चर्चा की पृष्ठभूमि में गाय के दूध, दही, घी, मूत्र एवं गोबर के औषधीय गुणों को वैज्ञानिक तरीको से सिद्ध या कि असिद्ध करने के लिए चलाया गया वैज्ञानिक प्रयास ‘विज्ञान का अपमान’ कैसे हो सकता है !

क्यों वर्तमान सरकार का यह वैज्ञानिक प्रोग्राम किसी धर्म या जाति के मुद्दो से जोड़ कर देखा जा रहा है!

यह एक सोचने का विषय है कि जब आस्ट्रेलिया का Centre for Digestive Diseases in Sydney ‘मल’ को औषधि के रूप में प्रयोग करता है तो यही वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी एवं पत्रकार इसे ‘वैज्ञानिक अनुसन्धान’ एवं ब्रेकथ्रू की संज्ञा देते हैं, और जब भारत इसी ‘मल’ (पंचगव्य) के औषधीय गुणों का वैज्ञानिक विधियों से अध्ययन करना चाहता है तो यह प्रयास ‘अवैज्ञानिक’ कैसे हो सकता है और क्यों यह ‘विज्ञान का अपमान’ हो सकता है ?

क्या इस तरह की बयानबाजी करने वाले वैज्ञानिको, बुद्धिजीवियों एवं विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक जर्नल ‘Science’ के विज्ञान पत्रकारों को Fecal microbiota एवं उस से जुड़े वैज्ञानिक अनुसंधानों के विषय में कोई जानकारी नहीं है? क्या उनको नहीं ज्ञात है कि Food and Drug Administration (FDA) जैसी विख्यात संस्था नें भी ‘मल’ को दवाई (drug) के रूप में मान्यता दी है |

अगर इस तरह की बयानबाजी करने वाले तथाकथित वैज्ञानिको, बुद्धिजीवियों, विज्ञान पत्रकारों को इस  विषय में कोई जानकारी नहीं है, तो उनको ‘विज्ञान संग्रह’ में प्रकाशित यह लेख ध्यान से पढना चाहिए और इस तरह की बयानबाजी करने से पहले सोचना चाहिए कि कही वो स्वयं किसी दुर्भावना से ग्रस्त होकर अवैज्ञानिक बयानबाजी तो नहीं कर रहे हैं |

डॉ सुनील कुमार वर्मा


Article reviewed by:

Dr Bhoj Raj Singh
Principal Scientist & Act. Head of Epidemiology Division
Indian Veterinary Research Institute
Bareilly, Uttar Pradesh, India

(More about Dr Bhoj Raj Singh)

Additional comments from Dr Bhoj Raj Singh

  1. बच्चों का पेट कराब होने पर, गौरय्या चिड़िया की 3-4 बीट एक चम्मच पानी में घोलकर भारत में दादी नानी सदियों से घरेलू नुक़से के तौर पर इस्तेमाल करती रही हैं.
  2. ज़्यादातर प्रोबायोटिक्स जीवाणुओं का प्राथमिक श्रोत विष्ठा में में मिलने वाले जीवाणु ही हैं. स्वस्थ प्राणी की विष्ठा उचित मात्रा में दिए जाने पर एक उत्तम सिन-बायोटिक्स है.

Abridged version of this article (as given below as such) was published as ‘eLetter to the Editor’ in the Journal ‘Science’ published by AAAS, USA. This letter was appropriate reply to those who  were restlessly criticizing move of India to begin a scientific program on cow panchagavya.

RE: Letter on In Depth “Critics assail India’s attempt to ‘validate’ folk remedy”

  • Sunil Kumar Verma, Principal Scientist, CSIR Centre for Cellular and Molecular Biology, Hyderabad 500 007, India

Science AAAS - विज्ञान India’s move to validate (or invalidate) the medicinal use of panchagavya, a mixture made of cow urine, dung, milk, yogurt, and clarified butter, as prescribed in Ayurveda in ancient times is being heavily criticized as also discussed recently in Science (1). The critics, who are mostly the scientists or scientific writers have decry it as an attempt to add a veneer of legitimacy to unscientific claims, an insult to science, or an attempt by India’s Hindu nationalist government to enlist the nation’s science to support its worldview. This move is said to undermine scientific institutions and demoralize sincere researchers by some critics (1).

Through this letter, I would like to highlight that the presence of large number of beneficial gut microflora in stool or fecal material has long been acknowledged by modern science (2) and Fecal microbiota transplant (FMT) via various routes including the oral routes is the recognized method of treatment of many human ailments (3). Centre for Digestive Diseases in Sydney has been using the stool therapy for the treatment of Clostridium difficile since last 20 years and also considering treating patients suffering from ulcerative colitis, irritable bowel sydrome, constipation and Crohn’s disease. Stool has also been recognized as drug by Food and Drug Administration (FDA) in 2013 and it is specifically cited that stool meets the definition of a drug within the meaning of section 201(g) of the Federal Food, Drug, and Cosmetic Act (21 U.S.C. 321(g)). Stool banks are being established in entire Europe for the purpose of collecting, preparing, and storing FMT products for distribution to other establishments, health care providers, or other entities for use in patient therapy or clinical research (see 4).

In this view, and the fact that ‘panchagavya’ is a rich source of microbiota present in fecal material, urine, milk, yogurt and butter, it is not appropriate to assail the current move of India to test the therapeutic potential of panchagavya. It is not an unscientific move, neither an insult to science. It has nothing to do with alleged Hindu agenda of current Indian government; and it is completely a scientific program, which deserve support and encouragement from scientific community.

References and Notes:

1. S. Kumar, Critics assail India’s attempt to “validate” folk remedy. Science 355, 898–898 (2017)
2. B. Eiseman, W. Silen, G.S. Bascom, A.J. Kauvar, Fecal enema as an adjunct in the treatment of pseudomembranous enterocolitis. Surgery 44, 854-859 (1958).
3. T.J. Borody, L.J. Brandt, S. Paramsothy, Therapeutic faecal microbiota transplantation Current Opinion in Gastroenterology 30, 97–105 (2014).
4. Enforcement Policy Regarding Investigational New Drug Requirements for Use of Fecal Microbiota for Transplantation to treat Clostridium difficile Infection Not Responsive to Standard Therapies. Food and Drug Administration, 2013; https://www.fda.gov/downloads/BiologicsBloodVaccines/GuidanceComplianceR…

After the above eLetter was published in Science, there has been extensive discussion in social media also about the issue of Panchgavya – you can read here And  here  and also here

Also read – My recent “Letter to The Editors” published in Science: Pages From My Diary

Pooh sold here

File Photo: Pooh Sold here (http://vigyaan.org/article/555/)

Bibliography and Notes

1.
Jandhyala SM. Role of the normal gut microbiota [Internet]. World Journal of Gastroenterology. Baishideng Publishing Group Inc.; 2015. p. 8787. Available from: http://dx.doi.org/10.3748/wjg.v21.i29.8787
2.
Bhoj R Singh. 2012. Emergence of antimicrobial drug resistance is mandatory for life on the earth. https://goo.gl/lP3AUt.
3.
T.J. Borody, L.J. Brandt, S. Paramsothy, Therapeutic faecal microbiota transplantation Current Opinion in Gastroenterology 30, 97–105 (2014).
5.
Bakken J. Fecal bacteriotherapy for recurrent Clostridium difficile infection. Anaerobe. 2009 Dec 1; 15: 285–9. [PubMed]
6.
Lewin R. More on Merde. Perspect Biol Med. 2001 Oct 1; 44: 594–607. [PubMed]
7.
EISEMAN B, SILEN W, BASCOM G, KAUVAR A. Fecal enema as an adjunct in the treatment of pseudomembranous enterocolitis. Surgery. 1958 Nov 1; 44: 854–9. [PubMed]
8.
Enforcement Policy Regarding Investigational New Drug Requirements for Use of Fecal Microbiota for Transplantation to treat Clostridium difficile Infection Not Responsive to Standard Therapies. Food and Drug Administration, 2013. https://goo.gl/jc5Bta.
9.
National Steering Committee on Scientific Validation and Research on Panchgavya formed by the Ministry of Science and Technology, Govt of India. Access URL – https://goo.gl/3mnoJm. Access date: 10/06/2017.
10.
India is becoming great again as IIT Delhi plays with cow urine, dung. Access URL: https://goo.gl/QnWsGp. Access date: 10/06/2017.
11.
Kumar S. Critics assail India’s attempt to “validate” folk remedy [Internet]. Science. American Association for the Advancement of Science (AAAS); 2017. p. 898–898. Available from: http://dx.doi.org/10.1126/science.355.6328.898

Cite this Article


Dr Sunil Kumar Verma. Peer Reviewed Article
मल / विष्ठा (stool/fecal material) से बीमारियों का इलाज़
. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/article/555/. Retrieved November 17, 2017.

Tags: , , , , , ,

blank

About the Author ()

Dr Sunil Kumar Verma is an experienced Principal Scientist with a demonstrated history of working in the research industry for more than 20 years. Skilled in Molecular Medicine, Genetics, Translational Research and Wildlife Forensics, Dr Verma has done his doctorate from the University of Oxford. UK.

He had been the inventor of ‘Universal Primer Technology’ (US Patent 7141364), which led to the establishment of India’s first wildlife forensics cell in the LaCONES of CCMB to provide wildlife forensics services to the nation.

He is also the recipient of several national and international awards and honours, including the 2008 CSIR Technology Award, the 2009 NRDC Meritorious Invention Award of Govt. of India and the 2009 BioAsia Innovation Award in recognition of his contribution to Indian science and technology.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *