मौलिक विज्ञान में प्राचीन भारत: भाग 1

| November 23, 2017 | 0 Comments

मौलिक विज्ञान में प्राचीन भारत

अघोरी को काव्य में रुचि है, निदा फ़ाजली उर्दू के प्रसिद्द कवि थे,जब सारे मुसलमान पाकिस्तान भाग रहे थे तो वो भारत भाग आए थे, यह अलग कथा है, फिर कभी। निदा साहब पिछले वर्ष मर गए, उन्होंने युवा जोड़ों के मनोभाव पर लिखा था- “तेरे मेरे नाम नए हैं दर्द पुराना है |”

यह बात इस्लाम और इसाइयत पर भी लागू है- तेरे मेरे शस्त्र नए हैं युद्ध पुराना है |

ये दोनों सभ्यताएं आपस में लडती रही, अपनी जड़ता से उस ज्ञान का नाश करती रही जो उनके पुरखों ने बाहर से सीखा | परन्तु ज्ञान की धारा कभी लुप्त नही होती, वह अपना मार्ग खोज लेती है, कभी तीव्र तो कभी मंद पर वह निरंतर है और निरंतर ही रहेगी|

ज्ञान-विज्ञान प्रकृति की मूल चेतना है, इसे कितना भी दबाया जाए, मिटाया नही जा सकता| विज्ञान के इतिहास लेखन की सबसे बड़ी समस्या इसके स्रोतों का व्यापक क्षेत्र में फैला हुआ और अनियमित होना है| विज्ञान को पश्चिम की देन मानने वाले वाले लोग यह भूल आते हैं कि पश्चिम के इतिहास में ऊपर-ऊपर तलवार की चमक और उसके नीचे रक्त की धारा दिखती है, पर उसके भी नीचे छिपे ज्ञान के इतिहास की प्रवाहित धारा को हम देख नहीं पाते हैं|

सर्वप्रथम यह सत्य जान लें कि ग्रीकों और अरबों के नाम पर विज्ञान की जितनी भी खोजें लिखी हैं, वो सब ग्यारहवीं सदी के पूर्व की नहीं है| अरस्तू प्लेटो अदि के नाम का दो हजार वर्ष पुराना जो कुछ भी है, वो अधिकांश मिथ्या है| यह सुनकर हजारो ज्ञानियों के कान खड़े जाएंगे, लोग पूछ सकते हैं कि अघोरी किस आधार पर ऐसा बोल रहा; पर आने वाले शब्दों में यह बातें मैं प्रमाण के साथ सिद्ध करूंगा| सभी प्रमाण स्थापित विज्ञान के विदेशी स्रोतों से ही दूंगा, क्योंकि पढ़े लिखे लोग उसी को मानते हैं जो किसी डिग्री या सर्टिफिकेट वाले ने कही है|

संवाद के इस मंच पर जो लोग गम्भीर चर्चा और अध्ययन में रूचि रखते हैं, वही यहाँ से आगे पढ़ें क्योंकि यहाँ मनोरंजन नहीं है, बहुत सी बातों के लिए आपको कई सन्दर्भ खंगालने पड सकते हैं, किताबें पढनी पड़ेगी| यदि लोगों के कुछ प्रश्न मिलेंगे तो यथासंभव सुअवसर पर लेख में ही उत्तर लिखता जाऊंगा|

आज विज्ञान का इतिहास लेखन चर्च की बड़ी बड़ी धूर्तताओं से भरा है, अरब ने विज्ञान में तरक्की की थी और उनसे यह ज्ञान ग्रीकों और यूरोपियों तक गया| इस प्रकार के कई झूठ अथवा अर्धसत्य को इन्होने लम्बे समय तक स्थापित किए रखा पर अब नए शोधों ने इन सबका खंडन कर दिया है|

स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के जे. एम. स्टिलमैन का लिखा पढ़ेंगे तो आपकी आँखें फ़ैल जाएँगी| वो लिखते हैं की रसायन विज्ञान के अतीत की चर्चा में जब हम जाते हैं तो ग्रीक दार्शनिक थेल्स से एरिस्टोटल/अरस्तू तक सभी के बारे में जानने के लिए हम प्लेटो और अरस्तू आदि के लेखन को प्रमाण लेते हैं| रोचक बात है कि वे सभी (मुख्य लोग जिनका लिखा आज प्रमाणिक माना जाता है) रसायनशास्त्री थे ही नहीं, जैसे- Theophrastus of Eresus (जन्म ३७१ ई.पू.), Pollio Vitruvius (प्रथम सदी ई.पू.), Dioscrides और Pliny the Elder (इसाई प्रथम सदी).

अघोर_अतीत

क्रमशः

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BholeNath Aghori. मौलिक विज्ञान में प्राचीन भारत: भाग 1. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/aghorinath/1582/. Retrieved January 20, 2018.

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बाबा अघोरी नाथ कौन हैं, कहाँ रहते हैं, क्या है, क्या थे, शायद बिरले ही जानते होंगें| आपके लेखन से यह तो विदित है कि आप अपने काल के विख्यात वैज्ञानिक या प्रोफेसर ही रहे होंगें, किन्तु आपकी लेखनी की विद्वता का पुट आपको किसी महामानव से कम सिद्ध नहीं करता |

आज, आप सोशल मीडिया में गुरुदेव भोलेनाथ अघोरी के नाम से विख्यात हैं | विष्णु कुमार के नाम से विभिन्न विषयों पर लिखते हैं और खूब लिखते हैं | फेसबुक आपको ना जाने कितनी बार आपके बेबाक सत्य लेखन के लिए ब्लाक भी कर चुकी है | अपने परिचय में आप सिर्फ इतना लिखते हैं “एक राष्ट्रसेवक, संसार की भीड़ के बीच एक भरतवंशी शिशु। मातृभूमि के विस्मृत गौरव की खोज में…।”

मुझे आपके लिए यें लाइने लिखते हुए अपनी ही लिखी हुयी दो लाइन याद आ रही हैं – कि बेरहम शूलों की उलझनों में उलझे गुलाब, भले ही कैद हो जाएँ, किन्तु इनकी सुगंधों को बाँध लेना, नामुमकिन है ऐ दोस्त…!!

आप जो भी हैं, जहाँ भी हैं, इस समाज के लिए अन्धकार में सितारे की तरह हैं, जो सृष्टि में न जाने कहाँ स्थित होकर, टिमटिमाते हुए पृथ्वी के अन्धकार को लील लेने के लिए दृढ प्रतिज्ञ है| इन्ही शब्दों के साथ, आपके लेखन को “विज्ञान” पत्रिका के माध्यम से जन साधारण तक पहुंचाने में मुझे अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है | आशा है, आप सब को बाबा अघोरीनाथ का विज्ञान विषयों पर विचारशील लेखन पसंद आएगा और मार्गदर्शक सिद्ध होगा |

सम्पादक…”विज्ञान पत्रिका”

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