धान के पुआल को मत जलाओ, उससे कम्पोस्ट बनाओ और धन कमाओ

 सत्यप्रकाश त्यागी , लिवलीन शुक्ला एवं अनिल कुमार सक्सेना

सूक्ष्म जीव-विज्ञान संभाग, भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान,नई दिल्ली -12    

हमारे देश में कृषि की आधुनिक तकनीकियों के प्रचलन से देश के उत्तरी मैदानी भागों में भी धान की खेती करने का चलन काफी बढ गया है जिसके परिणामस्वरुप धान के पुआल की मात्रा में काफी वृद्धि हुई है | देश में लगभग 3,000 मिलियन टन जैविक अपशिष्ट वार्षिक उत्पादित होता है, जिसमे मुख्य रूप से फसल अपशिष्ट, पशु बाडे का कचरा, ग्रामीण तथा शहरी कचरा, सब्जी मंडी का अपशिष्ट, जंगलों एवं उद्योगों का कचरा आदि शामिल होता है , जिसमे फसल अवशेष लगभग 388 मिलियन टन प्रति वर्ष उत्पादित होता है |

कुल फसल अवशेष का लगभग 27% गेहूं अवशेष एवं 51% धान का अवशेष एवं बाकी अन्य फसलों का अवशेष होता है | गेहूं एवं अन्य फसलों का भूसा / अवशेष  तो फिर भी पशुओं के खाने के काम आ जाता है लेकिन धान का पुआल पशुओं के चारे के काम भी नही आता क्योंकि इसमें सिलिका एवं ऑगजेलिक अम्ल कि मात्रा अधिक होती है और पशु इसे आसानी से नही पता पाते |

धान के पुआल में पाए जाने वाले घटक :

घटक मात्रा (%)
सिलिका 11-15
लिगनिन 12
सेलूलोज 40
हेमिसेलूलोज 20
निम्न पाचनशक्ति 40
उच्च कार्बन:नत्रजन 90:1

Rice Husk

फोटो: धान का पुआल

यदि धान के पुआल को सीधा खेत में ही जोत दिया जाये तो वह आहिस्ता – आहिस्ता सडना शुरू हो जायेगा और उसके अंदर मौजूद पौषक तत्व मिट्टी में मिलकर उसकी उर्वरा शक्ति बढाने में सहायता करेंगे | इस प्रक्रिया में एक तो समय अधिक लगता है दूसरे धान के पुआल में कार्बन : नत्रजन अनुपात अधिक होने के कारण पौध विषाक्ता बढ़ जाती है जिससे बीज का जमाव कम होता है जो उत्पादन पर असर डालता है |

यही नही धान के पुआल में सिलिका एवं लिगनिन की अधिक मात्रा होने के कारण यह मुश्किल से सड़ता है | दूसरी तरफ किसान भाई उसको जल्दी सडाने के लिए धान के पुआल को खेत में फैला कर उसके ऊपर अधिक मात्रा में यूरिया छिडककर पानी भर देते है | इससे पुआल तो जल्दी सड़ जाता है लेकिन यूरिया कि अधिक मात्रा के कारण उसकी कार्बन:नत्रजन अनुपात में कमी आ जाती है और यदि यह अनुपात 25:1 से कम हो जाता है तो इसके कारण सूक्ष्मजीव उपलब्ध नत्रजन का उपयोग नही कर पाते, ऐसी स्तिथि में नत्रजन अमोनिया में बदल जाती है जो बदबूदार होती है और इस प्रकार नत्रजन का उचित उपयोग नही हो पाता |

धान के पुआल को खेत में जोत कर मिट्टी में मिलाने से एक और समस्या पैदा हो जाती है जिसके कारण मृदा में मौजूद पौषक तत्व विशेषकर नत्रजन गतिहीन /स्थिर हो जाती है जो पौधों को उपलब्ध नही हो पाती | धान की फसल के बाद किसान भाई गेहूं लगाने की तैयारी में जुट जाते है और इस जल्दी बाजी में वे धान के पुआल को खेत में फैलाकर उसमें आग लगा देते हैं |

Fire in Rice Husl

फोटो: धन के पुआल में लगी हुयी आग एवं धुवां

धान के पुआल में आग लगाना कितना हानिकारक :

फसल अवशेषों, खासकर धान के पुआल को जलाने से एक बहुत बड़ी आर्थिक हानि होती है क्योंकि इसमें लगभग 51.76% आर्गेनिक कार्बन, 0.65% नत्रजन, 0.20% फस्फोरस एवं     0.30%पोटाश होती है, अत: इसे जलाने से पौषक तत्व नष्ट हो जाते हैं | दूसरी तरफ इसको जलाने से बहुत ही जहरीली गैसें जैसे कार्बनडाइऑक्साइड, कार्बनमोनोऑक्साइड, नाइट्सऑक्साइड, मीथेन, बैंजीन एवं एरोसोल आदि निकती है| ये गैसें हवा में मिलकर उसे प्रदूषित कर देती है और हमारा समूचा वातावरण दूषित हो जाता है | इन जहरीली गैसों के कारण जीवों में तरह – तरह की बीमारी जैसे त्वचा, आँखों की बीमारी , सांस व फेफड़े की बीमारियाँ एवं कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियाँ फैलती हैं |

एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार अकेले पंजाब राज्य में प्रति वर्ष लगभग 197 लाख टन धान का पुआल जला दिया जाता है, भारत सरकार एवं राज्य सरकारें सभी कृषि जन्य अवशेषों को जलाने के लिए मना करती है क्योंकि इससे बहुत बड़ी हानि होती है|

मृदा के लिए कम्पोस्ट अति आवश्यक:

यदि हम गेहूं और चावल को एक अनुक्रम में लगाते है तो इससे लगभग 6-7 टन प्रति हैक्टर चावल एवं 4-5 टन प्रति हैक्टर गेहूं पैदा होता है जो लगभग 300 किलोग्राम नत्रजन, 30 किलोग्राम फास्फोरस एवं 300 किलोग्राम पोटाश प्रति वर्ष मृदा से हटा देती हैं | इस प्रकार हमारी मृदा में पौषक तत्वों की कमी होती जा रही है और उसकी उर्वराशक्ति कम होती जा रही है |

हमारे देश मे जैविक अवशेषों को जलाने से लगभग 4.27 मि. टन नत्रजन, 2.31 मि.टन फास्फोरस एवं 7.42 मि.टन पोटाश जैसे जरूरी पौषक तत्व जलकर नष्ट हो जाते है | किसान भाई अधिक उत्पादन लेने के लिए रासायनिक कृषि प्रणाली अपना रहे है तथा पौषक तत्वों की पूर्ति के लिए एवं फसल सुरक्षा के लिए अधाधुंध तरीकों से रासायनिक खादें व दवाएं डाल रहे हैं, ऐसी स्तिथि में हमारी मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा प्रतिदिन बिगड़ती ही जा रही है |

देश की प्रतिपल बढ़ती हुई जनसंख्यां की उदरपूर्ति के लिए मृदा की उर्वराशक्ति को बनाए रखना व उत्पादन बढाना हमारे सामने आज की सबसे बड़ी चुनौती है | इस चुनौती से निपटने के लिए हमे कृषि जन्य अवशेषों एवं अन्य जैविक कचरे का कम्पोस्ट खाद बनाकर उसका उचित प्रबंधन करना होगा इससे हमारी मृदा को जरूरी पौषक तत्व उपलब्ध होंगे, मृदा की उर्वराशक्ति बनी रहेगी, पौषक तत्वों की हानि नही होगी एवं हमारा वातावरण शुद्ध रहेगा |

धान के पुआल से कम्पोस्ट बनाना एक सुरक्षित विकल्प :

कम्पोस्ट बनना एक आक्सीकृत जैव रूपांतरण प्रक्रिया है जिसमे एक सम्रद्ध एवं विविध सूक्ष्म बायोटा (सूक्ष्म समजीवजात) की आवश्यकता होती है | कार्बनिक पदार्थों का अणुजीवी परिवर्तन होने से एक  उप उत्पाद प्राप्त होता है, जब उस उप उत्पाद (कम्पोस्ट) को मृदा में मिलाते है तो उसके कारण पौधों को अनेकों लाभ मिलते हैं और पौधे स्वास्थ्य होते है | कम्पोस्टिंग वह प्रक्रिया है जो कचरे के निपटान में महत्वपूर्ण योगदान देती है, पर्यावरण संरक्षण में वृध्दि करती है तथा मृदा की उर्वराशक्ति को बनाए रखती है |

कम्पोस्टिंग पूर्ण रूप से एक जैविक प्रक्रिया है जिसमे सूक्ष्म जीवों द्वारा है वायवीय दशाओं में जैविक पदार्थों का जैविक अपघटन होता है | कम्पोस्ट का बनना सूक्ष्म जीवों की योग्यता पर निर्भर करता है कि वे अपघटित करने वाला कितना एंजाइम स्रावित करते हैं | वर्तमान में उत्तम गुणवत्ता युक्त कम्पोस्ट बनाने के लिए किसी विशेष सब्सट्रेट पर कम्पोस्टिंग प्रक्रिया को अपनाने की सख्त जरूरत है | हमारे पूर्वज मृदा की उर्वरता एवं फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए जैविक खादों पर ही निभर्र थे, कम्पोस्ट खाद का प्रयोग बहुत पहले से ही अच्छी तरह जाना जाता है | लेकिन आधुनिक खेती पूरी तरह रासायनिक खेती बन गई है | रासायनिक खादों, कीटनाशकों, कवकनाशकों तथा खरपतवारनाशकों का अनियमित एवं अधाधुंध प्रयोग करने से आज हमारा पूरा वातावरण (जल, वायु तथा मृदा) बुरी तरह प्रदूषित हो गया है |

इन खतरनाक रसायनों के कण वायु तथा भोजन श्रंखला के जरिये मानव स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं तथा इसके परिणामस्वरुप अनेकों जीवों की प्रजातियां लुप्त हो गई है | आज हमारी मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है ऐसी स्तिथि में वातावरण सुरक्षा एवं खाद्य सुरक्षा के लिए मृदा स्वास्थ्य एवं टिकाऊ उत्पादन एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई हैं | प्राकृतिक संसाधनों का रखरखाव एवं उनका उचित उपयोग आज की सबसे बड़ी जरुरत हैं इस दिशा में सूक्ष्मजीवों का बहुत बड़ा योगदान है | कृषिजन्य फसल अवशेषों से कम्पोस्ट खाद बनाने में भी ये सूक्ष्मजीव एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है जब इनको फसल अवशेष (धान का पुआल आदि) के साथ मिलाते है तो ये उसका तेजी से अवक्रमण कर थोड़े ही समय में अच्छी कम्पोस्ट तैयार हो जाती है |

धान के पुआल से कम्पोस्ट बनाने के विधि एवं आवश्यक सामग्री :

धान के पुआल से कम्पोस्ट बनाने के लिए गड्ढा विधि एवं ढेर विधि का प्रयोग किया जाता है | गड्ढे की लम्बाई 10 मी. ,चौड़ाई 1 मी. एवं गहराई 1 मी. रखते है यदि अवशेष ज्यादा है तो गड्ढे की लम्बाई बढा सकते है लेकिन गड्ढे की लम्बाई बढाने से अच्छा तो गढ्ढों की संख्या बढाना अच्छा रहेगा | सबसे पहले अवशेषों (कूड़ा – करकट , भूंसा आदि) की लगभग 8 इंच मोटी परत लगाकर 60-70 प्रतिशत नम कर लेते है |

खाद को अधिक प्रभावशाली एवं पोषक बनाने के लिए राक फास्फेट (1%), पाईराइट (10%) का मिश्रण भी प्रयोग कर सकते हैं | कार्बनिक पदार्थ ,(धान का पुआल) गोबर का सड़ा हुआ खाद, गोबर का घोल एवं खेत की मिट्टी को 8:1:0.5:0.5 अनुपात में रखकर लगभग 4 इंच मोटी परत चढा दें और कम्पोस्ट के टीके से उपचारित करें | गढ्ढा भरने तक यह प्रक्रिया बार-बार दोहराए तथा उपचारित अवशेष को पन्द्रह दिन के अंतराल से पलटाई करते रहे ताकि मिश्रण में हवा का आदान प्रदान बना रहे और सम्पूर्ण पदार्थ पूरी तरह अपघटित हो सके | कम्पोस्टिंग के दौरान यह ध्यान रहे कि पानी कि कमी न हो पाए तथा कम्पोस्ट तैयार हो जाने के बाद उसे पानी से नम न करें|

पूसा कम्पोस्ट टीका :

IARI- Compost Inoculant

Image: IARI- Compost Inoculate

संस्थान के सूक्ष्म जीव विज्ञान संभाग द्वारा निम्न फफूंदो कि सह – व्यवस्था तैयार की है जो कृषि अवशेष को शीघ्रता से अपघटित कर कम्पोस्ट में परिवर्तित कर देतीं हैं |

  1. एस्परजिलस एवामोरी (सेल्युलोलाईटिक एवं फास्फोरस विलेयी फफूंदी)
  2. एस्परजिलस निडूलेन्स (सेल्युलोलाईटिक फफूंदी)
  3. ट्राईकोडरमा विरिडी  (सेल्युलोलाईटिक फफूंदी )
  4. फिनेरोकीट क्राईसोस्पोरियम  (लिग्नोलाईटिक फफूंदी )

Compost Inoculam

Photo: Compost Inoculant

धान के पुआल से कम्पोस्ट बनाने में निम्न सावधानियां बरतनी चाहिए :

  • धान के पुआल में कार्बन:नत्रजन का अनुपात बहुत अधिक होता है ( 90 : 1) जो हानिकारक होता है इसे कम करने के लिए (50 : 1 ) उसमे (8 : 1) गोबर या कुक्कुट बीट या 1% यूरिया मिलाते हैं |
  • धान के पुआल की नमी 65% रहनी चाहिए |
  • प्रत्येक पन्द्रह दिन बाद गड्ढे / ढेर की पलटाई अवश्य करें |
  • कम्पोस्ट को और अधिक पौष्टिक बनाने के लिए जब उसका तापमान 35 डिग्री सेन्टीग्रेड आ जाए तो उसमे एजोटोबैक्टर एवं एजोस्पिरिलम का कल्चर मिलाएं इससे नत्रजन में वृद्धि हो जाती है | फास्फोरस की वृद्धि के लिए उसमे फास्फोरस विलेयी कल्चर मिलाए
  • अपरिपक्व कम्पोस्ट प्रयोग नही करना चाहिए क्योंकि उसमे फीनोलिक यौगिकों की मात्रा अधिक रहती है जिसके कारण पौध विषाक्ता हो जाती है |

तैयार कम्पोस्ट

परिपक्व कम्पोस्ट खाद की पहचान :

  • परिपक्व कम्पोस्ट का रंग गहरा भूरा या काला होता है |
  • उसमें किसी भी प्रकार की बदबू नही होनी चाहिए
  • उसमे मिट्टी जैसी गंध आणि चाहिए |
  • उसमे तीक्ष्ण खट्टी जैसी, अमोनिया या सड़ी हुई बदबू नही होनी चाहिए |
  • उसका पी.एच. मान 5 से 8.0 के बीच होता है |
  • कार्बन : नत्रजन अनुपात 30-35 : 1 अच्छा होता है |
  • नमी की मात्रा 35 – 50 % होनी चाहिय |
  • जैव पदार्थ 35 – 45% होना चाहिए |
  • उसके कणों का आकार कम से कम 90% कम्पोस्ट पदार्थ वजन के द्वारा ½ इंच की स्क्रीन से गुजर जाना चाहिए|

निष्कर्ष : जब फसल अवशेषों (धान का भूंसा या अन्य अवशेष) में लिग्नोसेल्युलोलाईटिक एवं सेल्युलोलाईटिक फफूंदों को मिलाया जाता है तो फसल अवशेष कम समय में कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित हो जाता है | यह कम्पोस्ट हमारी मृदा को नव जीवन प्रदान करती है तथा एक बड़ी मात्रा में पौधों को पौषक तत्व प्रदान कर फसलोत्पादन बढाने में सहायता करती है | यह एक सस्ती, आकर्षित,बनाने में आसान एवं वातावरण अनुरूपि विधि है अत: इसका खूब दोहन करना चाहिए | बढ़ती हुई जनसँख्या कि उदर पूर्ति के लिए भविष्य में फसलोत्पादन बढाने के लिए मृदा कि उर्वराशक्ति बनाए रखने के लिए पौषक तत्वों कि जरूरत बढ़ेगी जिसे फसल अवशेषों एवं प्राकृतिक संसाधनों का कुशल प्रबंध कर पूरा किया जा सकेगा |

Disclaimer(s): (1) This article was submitted by author(s) for publication in Vigyaan. (2) Copyright of this article is retained by author(s) and ‘Vigyaan’ do not claim any copyright on this article and its content. (3) Author (SPT) has informed that this article was previously published in “Pusa Surabhi” IARI, annual Hindi patrika and it was also judged as best hindi popular articles by IARI and won first prize Rs.10,000/=

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विज्ञान डेस्क. धान के पुआल को मत जलाओ, उससे कम्पोस्ट बनाओ और धन कमाओ. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/agri/886/. Retrieved November 17, 2017.

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Comments (1)

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  1. डॉ सुनील कुमार वर्मा says:

    सर,

    आपने लेख में यह नहीं बताया कि पूसा इंस्टिट्यूट का कम्पोस्ट बनाने वाला फार्मूला, फफूंदी इत्यादि अगर किसान भाई लेना चाहे तो कैसे मंगाए – किस से मिले और इसका प्रयोग फील्ड में कैसे करे ? इस फफूंद को खरीदने में कितनी लागत आती है, यह भी बताने का कष्ट करें, अति कृपा होगी |

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