प्रकृति का वरदान – मेलाटोनिन हॉर्मोन’

| June 13, 2017 | 1 Comment

वर्ष 1940…. कुंदन लाल सहगल साहब गुनगुना रहे थे…

सो जा राजकुमारी सो जा…
सो जा मैं बलिहारी सो जा…
सो जा राजकुमारी सो जा…

इन ‘लोरियों’ से रिलीज होता है ‘मेलाटोनिन हॉर्मोन’ जो जिम्मेदार है ‘सरकेड़ियन रिदम’ बोले तो…. सोने और जागने के चक्र के लिए। 

मेलाटोनिन हॉर्मोन मनुष्यों और पशुओं की ‘पिनियल ग्लैंड’ में बनता है । बनता तो यह पौधों में भी है। वहाँ क्या करता होगा?

पौधे भी सोते और जागते हैं क्या?

हाँ…. अम्मा ने बताया था कि शाम के समय पेड़ से पत्ते मत तोड़ना। उस समय पेड़ पौधे सो रहे होते हैं। अम्मा को किसने बताया? उसकी अम्मा ने। और उन्हें…..? खैर….

सभी माँओ को पता होती हैं ये सब बातें। वैसे पौधों में यह बनता है स्ट्रेस की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप। चाहे वह तापमान का स्ट्रेस हो या पानी का या फिर सेलाइन सॉइल का या फिर किसी फंगस का।

पौधे के अंदर प्रतिरोधात्मक क्षमता विकसित करने में यह हॉर्मोन महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

वापस आते हैं मनुष्यों और पशुओं पर। तो मेलाटोनिन हॉर्मोन के प्रभाव से ही हम नियत समय पर सोते और जागते हैं। अगर इस हॉर्मोन की कमी हो जाए तो आप गुनगुनाने लगते हैं…. मुझे नींद ना आये मुझे चैन ना आये…. बोले तो आप अनिद्रा (इनसोम्निया) के शिकार हो जाते हैं।

बच्चों में आरम्भ में मेलाटोनिन का उत्पादन खूब होता है, और वह दिनभर सोते रहते हैं। तीन महीने की आयु पर यह काफी हद तक नियंत्रित हो जाता है, और रात्रि 12 बजे से सुबह 8 बजे तक इसकी सबसे अधिक मात्रा पाई जाती है।

जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं मेलाटोनिन का स्तर घटता जाता है, और उनकी नींद कम हो जाती है। वृद्धावस्था आते-आते मेलाटोनिन का स्तर बहुत कम हो जाता है और फिर उन पर इल्जाम लगाया जाता है कि ना खुद सोते हैं और ना दूसरों को सोने देते हैं! रात भर खटपट करते रहते हैं!

अरे भाई वो क्या करें? मेलाटोनिन का उत्पादन हो गया है कम। सोने और जागने का चक्र हो गया है ध्वस्त। शारीरिक स्थिति ऐसी है कि ज्यादा श्रम भी नहीं कर सकते कि थक कर नींद आ जाए। तो इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। गलती है मेलाटोनिन की।

मेलाटोनिन बहुत बढ़िया एंटीऑक्सीडेंट भी है, जो कि सेल मेम्ब्रेन को पार कर सकता है, और ब्लड-ब्रेन-बेरियर को भी पार कर सकता है; और ब्रेन को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचा सकता है| इस काम में यह विटामिन ई से भी दो गुना ज्यादा कारगर है|

इसका ‘एन्टी इन्फ्लामेट्री इफ़ेक्ट’ भी है। इसीलिए चोट लगने पर माँ लोरी सुना कर सुला देती थी, और कहती थी कि नींद चोट को हर लेती है।

सभी कशेरुकी प्राणियों में मेलाटोनिन अंधेरा होने पर मस्तिष्क के अंदर मौजूद एक छोटी सी ग्रंथि जिसे पिनियल ग्लैंड कहते हैं, से स्रावित होता है। इसीलिए इसे ‘हॉर्मोन ऑफ डार्कनेस’ (hormone of darkness) भी कहा जाता है।

सन 1970 तक यह माना जाता था कि यह बस मनुष्यों और पशुओं में ही बनता है। मगर वर्ष 1970 में वैज्ञानिकों ने इसे कॉफ़ी एक्सट्रेक्ट में भी ढूंढ लिया।

पहले तो यह माना गया कि यह एक्सट्रैक्शन प्रोसेस से आया होगा। फिर जब अन्य पौधों को टेस्ट किया गया तो यह सब जगह पाया गया। जड़, तना, पत्ती, फल व बीज सभी में। कितना पाया गया? पिकोग्राम से लेकर मिलीग्राम तक। किन पौधों में ज्यादा पाया गया? कॉफ़ी, चाय, वाइन, बियर में और मक्का, गेहूं, चावल, जौ और जेई में भी।

अब समझ में आया बचपन में मास्टर जी क्यों टोकते थे कि एक रोटी कम खा कर आया कर नींद ना आएगी क्लास में!

फलों में इसके सबसे बढ़िया स्रोत हैं – अन्नानास, संतरा और केला

चैन की नींद सोना चाहते हो – तो रात्रिभोज में इन तीनों फलों को स्थान दो। खाने के दो घंटे के अंदर ही मेलाटोनिन महाशय हाजिर हो जाएंगे और आप निद्रा देवी की गोद में नजर आएंगे।

इसकी सेल्फ लाइफ है 30 से 50 मिनट। अगर किसी वजह से आपको जागना ही हो तो उन खास 30 से 50 मिनट पर कंट्रोल कर लो जब मेलाटोनिन अपना जलवा दिखा रहा होता है। फिर ना नींद आएगी रात भर।

इसका एक्सक्रिशन होता है पेशाब में द्वारा। इसीलिए जब नींद सताने लगे और जागना आवश्यक हो तो दो चार गिलास पानी पी लो। एक तो पानी पीने से पेशाब ज्यादा आएगा और वो आपको वैसे ही नहीं सोने देगा दूसरे कुछ मात्रा में पेशाब के साथ मेलाटोनिन भी तो एक्सक्रीट होगा ही।

ऐसा क्या खाएं कि शरीर में मेलाटोनिन कुदरती तौर पर सही मात्रा में बनता रहे?

इसके लिए मैग्नीशियम रिच फ़ूड खाओ। जैसे बादाम और पालक। एक विदेशी फल है एवाकाडो – ये खाओ। अखाद्यभक्षी हों तो झींगा मछली खाओ।

और हाँ… गॉल ब्लैडर में यह हॉर्मोन कोलेस्ट्रॉल को पित्त में बदलने में सहायता करता है, और अगर गॉल ब्लैडर में पथरी हो जाये तो उन पत्थरों को निकालने में भी सहायता करता है।

वैसे तो गॉल ब्लैडर में होने वाले स्टोन पत्थर होते ही नहीं। वो या तो कोलेस्ट्रोल से बने होते हैं या फिर बिलीरुबिन पिग्मेंट से। तो क्या उन लोगों को गॉल ब्लैडर स्टोन होने की ज्यादा संभावना होती हैं जिनमें मेलाटोनिन का उत्पादन कम होता है? शायद हाँ।

मेलाटोनिन कम – तो नींद कम और बोनस के रूप में गॉल ब्लैडर स्टोन। डॉ साहब की तो बल्ले बल्ले….

और अंत में… वैज्ञानिक अनुसंधानों में यह भी पाया गया है कि किसी भी इलेक्ट्रॉनिक गेजेट की स्क्रीन की ब्राइटनेस भी मेलाटोनिन को रिलीज नहीं होने देती और आप करवटें बदलते ही रह जाते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन की वजह से, मेलाटोनिन रिलीज ना होने की दर बच्चों में बड़ों के मुकाबले दो गुनी होती है। इसलिए सोने के समय से कम से कम दो घंटा पहले सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बंद कर दें। कुर्सी की पेटी बांध लें। कुर्सी की पीठ सीधी रखें और खिड़की के शटर खुले रखें। इस उड़ान में धूम्रपान वर्जित है…. अरे ये क्या हुआ? लगता है कोई दूसरा चैनल लग गया……

बंशी बाबा

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Sanjeev Kumar Verma. प्रकृति का वरदान – मेलाटोनिन हॉर्मोन’. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/bb/1094/. Retrieved September 23, 2017.

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Comments (1)

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  1. गोपाल गोस्वामी says:

    सरजी तुस्सी ग्रेट हो

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