नरों में निप्पल्स एवं अन्य अवशेषी अंग: एक परिचय

| June 14, 2017 | 1 Comment

अवशेषी अंग…..वो अंग जो बेकार हैं…जिनकी उपयोगिता मनुष्य के लिए अब समाप्त हो चुकी हैं|

रही होगी कभी, हमारे पूर्वजों में। कालान्तर में प्रकृति को लगा होगा कि ये सब अंग बेकार हैं इसलिए अब इन अंगों का आयात-निर्यात बंद कर दो। जैसे डाक विभाग ने टेलीग्राम बंद कर दिया।

एक दो नहीं पूरे दस अंग हैं, जो अवशेषी हैं मानव शरीर में।

पहला है अपेंडिक्स।

जानते होंगे आप। तब काम आता था जब हमारे पूर्वज घास फूंस खाया करते होंगे। घास फूंस के पाचन में सहायता करता था। अब तो यह डॉक्टरों की सहायता करता है, मानव के पेट में इंफेक्टिड होकर। निकालने के एवज में डॉ साहब की नई कार की कई ईएमआई चली जाती हैं।

दूसरा है साइनस। बेकार है, कुछ काम का नहीं है, सिवाय सिर में दर्द करने के।

तीसरा है अक्कल दाढ़। जब निकलती है तो जान निकाल देती है। दांतों के डॉक्टर्स की कमाई का जरिया है, और कुछ नहीं।

चौथा है पूंछ की हड्डी। कुदरत ने मानव को पूंछ लगाकर भेजना बंद कर दिया, मगर आज भी ज्यादातर भरतवंशी पूंछ हिलाते नज़र आते हैं। शायद पुरातन काल की यादें अभी भी अवचेतन मन में अवशेष हैं।

पांचवा है कान की मांसपेशी। मानव में इसकी उपयोगिता तभी समाप्त हो गई थी जब से दीवारों के भी कान होने लगे।

छटा है रोंगटे खड़े करने वाली अररेक्टर पिली। पहले काम में आती रही होंगी – जैसे सीही अपने रोंगटे खड़े करके शत्रु को डरा देती है। जब से मानव ने दूसरों को डराना चालू किया तो उसमें यह अवशेषी अंग होकर रह गई।

सातवां है टॉन्सिल्स। ये भी डॉक्टर्स के बहुत काम का है, और हमारे किसी काम का नहीं।

आठवां है नरों में निप्पल्स। दूध पिलाने का काम मादा के हिस्से में आते ही नरों में यह अवशेषी हो गए। मानव क्या….. सभी स्तनधारियों में।

palmar reflex

File Photo: palmar reflex. License: Attribution Some rights reserved by shankar s.

नौंवा है पामर ग्रास्प रिफ्लेक्स। तब काम में आता था जब माता अपने बच्चे को अपने बदन से चिपका कर चलती रही होगी। कभी नवजात बच्चे की हथेली पर अपनी अंगुली रखकर देखना। मजबूती से पकड़ लेगा आपको। इतनी मजबूती से कि अगर आप उसे एक अंगुली के सहारे उठाना चाहो तो उठा लोगे। कभी उसे अपनी छाती से लगाकर उसके पैरों पर गौर करना। आपको जकड लेंगे। यह व्यवस्था लगभग छह माह तक कायम रहती है। यही पामर ग्रास्प रिफ्लेक्स है।

और दसवां है निकटिटेटिंग मेम्ब्रेन। उस समय काम में आती थी जब मानव के पूर्वज जलचर थे। बाद में थलचर होते ही इसका काम खत्म और इसका दर्ज़ा अवशेषी। आजकल निकटिटेटिंग मेम्ब्रेन की जगह ले ली है बेशर्मी के परदे ने। जब हमारे पूर्वज पानी में रहते थे तो एक पारदर्शक झिल्ली उनकी पुतली पर चढ़ जाती थी, जिसकी वजह से वो पानी के अंदर साफ़ साफ़ देख भी पाते थे, और आँख भी बच जाती थी। इसी को निकटिटेटिंग मेम्ब्रेन कहते हैं।

जलचर से स्थलचर होने पर यह आइटम ओब्सलीट हो गया। आजकल मानव में बस उसके अवशेष मौजूद हैं| आँख के एक कोने में। कहने का तात्पर्य यह है कि कुदरत ने उस हर चीज की सप्लाई बंद कर दी जिसकी जरुरत नहीं थी।

अब आते हैं 1.00 और 0.99 पर। कुदरत ने सभी को 1.00 बना कर भेजा। कुछ सिरफिरों ने उसे पकड़ा और 0.99 बना दिया। अरे मूढ़मतियों  – अगर इसकी आवश्यकता नहीं होती तो कुदरत ने यह काम हज़ारों, लाखों, अरबों साल पहले कर दिया होता। सब कुदरती तौर पर 0.99 पैदा होते। कुदरत को समझो, क्यों अपने दिमाग का दही कर रहे हो, और हमारे का भी? देख बेटा देख पेड़ पर तोता बैठा है और…खच्च।

अरे भाई यह अवशेषी अंग नहीं है। कुछ समझ पैदा करो……..प्रकृति ने आप पर बहुत मेहनत की है यह रूप प्रदान करने में। वन टाइम पासवर्ड हैं ये (OTP)। जीवन में एक बार ही मिलता है।

बंशी बाबा

Nipples in Men

File Photo: Nipples in Men. License AttributionNo Derivative Works  MichaelMcLean

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Sanjeev Kumar Verma. नरों में निप्पल्स एवं अन्य अवशेषी अंग: एक परिचय. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/bb/1097/. Retrieved November 17, 2017.

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About the Author ()

डॉ संजीव कुमार वर्मा, पीएचडी (पशु पोषण), पीजीडीटीएमए; एआरएस भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (ARS) के 1996 बैच के वैज्ञानिक हैं और वर्तमान में भाकृअनुप – केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं| इससे पूर्व डॉ वर्मा अनेक भारतीय संस्थानों में वैज्ञानिक सेवाएं दे चुके हैं। डॉ वर्मा ने लगभग नौ वर्ष तक पहाड़ी और पर्वतीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध के उपरांत लगभग 5 वर्ष तक द्वीपीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध कार्य किया। इसके बाद लगभग पांच वर्ष तक उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में गोवंश पर अनुसंधान करने के बाद लगभग एक वर्ष तक दक्षिणी कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में मुर्गीपालन पर अध्ययन किया। डॉ वर्मा कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों के लेखक होने के साथ-साथ वर्तमान में ‘एनिमल न्यूट्रिशन सोसायटी ऑफ इंडिया’, करनाल के ‘वाइस प्रेजीडेंट’ भी हैं और पशु पोषण के क्षेत्र में लगातार उच्च कोटि के अनुसन्धान एवं आम लोगों, किसानों एवं विद्यार्थियों तक विज्ञान के प्रचार प्रसार में कार्यरत हैं | सोशल मीडिया में डॉ वर्मा “बंशी विचारक” के नाम से जाने जाते हैं और देश के हजारों वैज्ञानिकों, छात्रों, एवं किसानों द्वारा लगातार फॉलो किये जाते हैं |

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  1. Sandeep says:

    👍👍

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