आपके मोटापे का दोस्त – ग्रेलिन (Ghrelin) हरमोंन

| June 26, 2017 | 2 Comments

ये भी खा लूँ, वो भी खा लूँ, बकरा भी खा लूँ, कटड़ा भी खा लूँ, सब खा लूँ। खा लो भाई,  खा लो, तुम्हीं खा लो सब…!

किसी और के लिए मत छोड़ना कुछ भी ! घर में और लोग तो हैं ही नहीं जैसे। एक अकेले तुम ही हो। लो तुम्हीं खा लो सब………….!

यह नाटक अक्सर घरों में होता रहता है, और ये ही डायलॉग बोले जाते हैं हर बार।

गलती उस पेटू की नहीं है जो सब कुछ खाने के बाद भी भूखा महसूस करता है। गलती है उसके पेट में बनने वाले हार्मोन की जिसे कहते हैं ‘ग्रेलिन’ (Ghrelin)।

ये ‘ग्रेलिन’ ही है जो ‘पेटू’ को हवा भरता रहता है, कि और खा, बेटा और खा, सब कुछ खा जा जो भी सामने रखा है। यह हार्मोन पेट के अलावा सूक्ष्म मात्रा में छोटी आंत में भी बनता है, पैंक्रियास में भी बनता है और बनता है मस्तिष्क में और ये ग्रेलिन मजबूर कर देता है उस ‘पेटू’ को खाते रहने के लिए।

ग्रेलिन ही है जो उसे समझाता है कि ‘खाये जाओ खाये जाओ प्रभु के गुण गाए जाओ’ और बस ‘पेटू’ आँख बंद करके पेलता रहता है जो भी मिल जाये।

वैज्ञानिक भाषा में ‘ग्रेलिन’ को ‘हंगर हार्मोन‘ भी कहते हैं। इसका काम करने का तरीका है बहुत मजेदार। पेट खाली होगा तो पेट में ग्रेलिन पैदा होगा, जो मस्तिष्क के हाइपोथेलेमस को सन्देश भेजेगा कि ‘आने दे माल आने दे’।

इसके विपरीत अगर पेट भरा होगा, तो यह पैदा नहीं होगा और ना ही मस्तिष्क को कुछ खाने का सन्देश जायेगा। इसलिए पेट को बहुत देर तक ख़ाली मत रखो।

हर चार घंटे पर कुछ ना कुछ खाते रहो। मगर ध्यान रहे जो खाया जाये वह कम कैलोरी वाला आइटम हो। जैसे खीरा, ककड़ी आदि आदि। प्रोटीन ज्यादा हो उसमें और ऊर्जा कम।

जैसे ही खाने में ऊर्जा की मात्रा बढ़ेगी तो ग्रेलिन का उत्पादन बढ़ेगा। दोहरी मार पड़ेगी। एक तो पहले ही ज्यादा कैलोरी कंज्यूम कर ली, ऊपर से ग्रेलिन ने पैदा होकर फ़रमान ज़ारी कर दिया – कि बेटा और खा अब मैं आ गया हूँ। कुल मिलाकर एनर्जी का इन्टेक बढ़ गया और बदले में बढ़ गया आपके पेट के घेरे का साइज़।

अब बात करते हैं उन परिस्थितियों की जो ग्रेलिन का उत्पादन बढ़ा देती हैं।

सबसे टॉप पर हैं ‘एम्एसजी’ महाराज। क्या बोला ‘मेसेंजर ऑफ़ गॉड’? अरे नहीं भाई ‘मोनो सोडियम ग्लूटामेट’  – जो डाला जाता है आपकी अपनी चिकनी चमेली ‘चाउमीन’ में।

आपके दिलों की धड़कन ‘मैगी रानी’ में। मैगी देखते ही आपके मुँह में जो पानी आता है ना, तो समझो ग्रेलिन पैदा होना चालु हो गया है।

अब आपकी खैर नहीं। पहले मैगी खाओगे। फिर कोक पियोगे। मैगी में एम्एसजी और जंक कैलोरी। कोक में जबरदस्त कैलोरी। और भी बहुत कुछ जैसे एसपारटेम…सैकरीन….कोक के बारे में ज्यादा पढना हो तो यहाँ पढो, या फिर इस आर्टिकल में पढो…

कुल मिलाकर आपने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। एम्एसजी ने कहा चुर्लू ढिच्चक ग्रेलिन पैदा हो जाओ। अतिरिक्त कैलोरी ने कहा ग्रेलिन पैदा हो जाओ। और ग्रेलिन पैदा हो गया, और उसके प्रभाव में आप खाते चले गए। खाओ खाओ, मरना तो सभी को है ही। कोई पहले कोई बाद में। और हाँ….बाबा रामदेव वाली मैगी में भी है ये एम्एसजी। ध्यान रखना।

दूसरे पायदान पर हैं ‘फ्रुक्टोस’ महाशय।

‘फ्रुक्टोस’ बोले तो  – वह शक्कर जो फलों में मिलती है। फल खाने पर तो थोड़ी मात्रा में आती है, मगर फ्रूट जूस पीने पर अधिक मात्रा में अंदर जाती है।

फ्रुक्टोस की अति होते ही ग्रेलिन का उत्पादन बढ़ जायेगा। इसलिए ज्यादा फल भी मत खाना। एक दिन में एक फल बहुत है। वैसे भी ‘इंडिया इज अ पुअर कंट्री’। थोड़ा हाथ कम रखो फलों पर – और अगर खाने भी हैं तो वो फल खाओ जिनमें फ्रुक्टोस की मात्रा कम हो, और विटामिन व मिनरल अधिक हों जैसे पपीता खाओ। खीरा खाओ। ककड़ी खाओ। खरबूजा व तरबूज खाओ।

तीसरे पायदान पर है बहुत कम कैलोरी वाली डाइट।

कुछ दिन तो सब सही चलेगा। आपको लगेगा भी कि भाई डाइटिंग पर हूँ। वजन भी कम कर लिया मैंने। मगर एक समय ऐसा आएगा कि आपका सब्र का बाँध टूट जायेगा, और आप फिर चालु हो जायेंगे – पेल कर खाने के लिए।

‘बहुत कम कैलोरी डाइट’ ग्रेलिन का उत्पादन बढाती है। इसलिए अगर डाइटिंग करनी भी है, तो खाना धीरे-धीरे कम करो। खाना तो खाओ मगर ऐसा खाओ जिसमें कैलोरी कम हों। मगर किसी भी कीमत पर 1000 कैलोरी प्रतिदिन से कम ना हों।

चौथे पायदान पर है frequency ऑफ़ फीडिंग।

हर चार घंटे पर कुछ ना कुछ खाओगे, तो ग्रेलिन का उत्पादन कम होगा।

और ये फास्टिंग-वास्टिंग बेकार की चीज हैं। और ये ‘जारो’ तो बिल्कुल बकवास आइटम है जो आजकल चल रहा है। सबका ग्रेलिन उत्पादन बढ़ जायेगा। खा-खा कर सूअर जैसे हो जायेंगे ग्रेलिन की मेहरबानी से। चलो मरने दो हमें क्या!!! जल्दी ही हूरों के पास पहुँच जायेंगे।

पांचवे पायदान पर है हाई फाइबर डाइट।

डाइट में फाइबर ज्यादा होगा तो वह पेट की दीवारों पर तनाव ज्यादा डालेगा, और ग्रेलिन का उत्पादन कम होगा।

इसलिए खाने से पहले अगर सलाद खाओगे या फिर वेजिटेबल सूप पियोगे, तो ग्रेलिन कम पैदा होगा और आप कम खाओगे।

छटे पायदान पर है ‘पर्याप्त नींद’।

कम सोने वालों में ग्रेलिन ज्यादा पैदा होता है, और उन्हें भूख ज्यादा लगती है। तो ‘नींद से जागने वालों सो जाओ नहीं तो ग्रेलिन आ जायेगा’।

सातवें पायदान पर हैं क्वालिटी ऑफ़ प्रोटीन।

प्रोटीन अगर एनिमल ओरिजिन का है, तो ग्रेलिन कम पैदा होगा। अब मैं यह तो नहीं कहूँगा कि मांसभक्षी बन जाओ। क्योकि एनिमल प्रोटीन के और अनगिनत नुक्सान हैं, जो अगले किसी लेख में….

आठवें पायदान पर है आपका तनाव।

तनाव ज्यादा, तो ग्रेलिन का उत्पादन भी ज्यादा। इसलिए पतला होना है तो तनाव कम करो। सुबह सवेरे घूमने जाओ, मेडिटेशन करो, योग करो या फिर अपने पसंदीदा गायक को सुनो। ‘आम में आम गुठलियों के दाम’, गाने सुनने की आदत डालोगे तो बीबी की चिक-चिक कम सुनाई देगी।

बल्कि उसको भी गाने सुनने पर लगा दो। आपको आराम रहेगा।

नौवे पायदान पर है ओमेगा 3 फैटी एसिड।

खाने में ओमेगा 3 फैटी एसिड ज्यादा, तो ग्रेलिन का उत्पादन कम। ग्रेलिन कम तो भूख कम – और भूख कम तो पेट का घेरा कम। ओमेगा एसिड्स पर कुछ वैज्ञानिक जानकारी यहाँ पढें |

दसवें पायदान पर है पेट व आँतों का स्वास्थ्य।

पेट और आंतें अगर स्वस्थ हैं तो ग्रेलिन और लेप्टिन अपनी औकात में रहेंगे।

पेट और आंतें स्वस्थ रखनी हैं तो लहसुन, प्याज खाओ, दही खाओ। ओह ‘लेप्टिन’। ओके ओके किसी दिन ‘लेप्टिन’ की भी लेंगे……ख़बर।

बंशी बाबा

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File Photo: आपके मोटापे का दोस्त – ग्रेलिन (Ghrelin) हरमोंन 

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Sanjeev Kumar Verma. आपके मोटापे का दोस्त – ग्रेलिन (Ghrelin) हरमोंन. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/bb/1205/. Retrieved November 17, 2017.

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About the Author ()

डॉ संजीव कुमार वर्मा, पीएचडी (पशु पोषण), पीजीडीटीएमए; एआरएस भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (ARS) के 1996 बैच के वैज्ञानिक हैं और वर्तमान में भाकृअनुप – केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं| इससे पूर्व डॉ वर्मा अनेक भारतीय संस्थानों में वैज्ञानिक सेवाएं दे चुके हैं। डॉ वर्मा ने लगभग नौ वर्ष तक पहाड़ी और पर्वतीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध के उपरांत लगभग 5 वर्ष तक द्वीपीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध कार्य किया। इसके बाद लगभग पांच वर्ष तक उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में गोवंश पर अनुसंधान करने के बाद लगभग एक वर्ष तक दक्षिणी कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में मुर्गीपालन पर अध्ययन किया। डॉ वर्मा कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों के लेखक होने के साथ-साथ वर्तमान में ‘एनिमल न्यूट्रिशन सोसायटी ऑफ इंडिया’, करनाल के ‘वाइस प्रेजीडेंट’ भी हैं और पशु पोषण के क्षेत्र में लगातार उच्च कोटि के अनुसन्धान एवं आम लोगों, किसानों एवं विद्यार्थियों तक विज्ञान के प्रचार प्रसार में कार्यरत हैं | सोशल मीडिया में डॉ वर्मा “बंशी विचारक” के नाम से जाने जाते हैं और देश के हजारों वैज्ञानिकों, छात्रों, एवं किसानों द्वारा लगातार फॉलो किये जाते हैं |

Comments (2)

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  1. Mukesh says:

    Its informative बाबा जी! 💐. Great

  2. धरा त्रिपाठी says:

    कितने मज़ेदार ढंग से आपने मोटापे के कारणों को बडी गूढ़ता से समझा दिए ।
    धन्यवाद सर !

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