अजगरबत्ती

| July 19, 2017 | 3 Comments

आज बात करते हैं ‘अगरबत्ती’ की।

वैसे इसे ‘अजगरबत्ती’ कहूँ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

सनातन धर्म की पूजा पद्धति में कहीं भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता। मगर यह कब और कैसे हमारे पूजा घरों और मंदिरों तक पहुंच गई यह तो बता पाना मुश्किल है। वैसे बौद्ध और ताओ धर्म के उपासक अगरबत्तियों का उपयोग काफी समय से करते आ रहे हैं।

अगरबत्ती का संघटन देखें तो इसमें होता है 21 प्रतिशत हर्बल और लकड़ी का पाउडर, 35 प्रतिशत सुगंध पैदा करने वाले पदार्थ, 11 प्रतिशत चिपकने वाला पाउडर और 33 प्रतिशत बांस की स्टिक।

अगर हम सिगरेट और अगरबत्ती की तुलना करें तो एक ग्राम सिगरेट जलने से मात्र 10 मिलीग्राम पार्टिकुलेट मैटर जनरेट होगा जबकि एक ग्राम अगरबत्ती से इसका साढ़े चार गुना और जो गैसें पैदा होंगी वो हैं कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, और सल्फर डाई ऑक्साइड और भी कई अन्य गैसें। इसके अलावा जो सबसे खतरनाक तत्व पैदा होंगे वह हैं बेंजीन, टोलुइन और जाइलीन जैसे वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स और एल्डिहाइड, पोलिसायकलिक एरोमेटिक हाइड्रोकार्बन।

जिस जगह भारी मात्रा में अगरबत्ती जलाई जाती हैं उस स्थान पर अधिक देर तक खड़े रहने से श्वांस रोग उत्पन्न होने का खतरा रहता है, और कभी कभी त्वचा रोग भी उत्पन्न हो सकते हैं।

ये पार्टिकुलेट मैटर है क्या?

किसी भी ज्वलनशील पदार्थ को जलाने पर विभिन्न आकार के ठोस व लिक्विड पार्टिकल वातावरण में बिखर जाते हैं, यही पार्टिकुलेट मैटर है। इनकी रासायनिक संरचना और इनका आकार महत्वपूर्ण है। जो बड़े कण हैं वह श्वसन तंत्र को कम हानि पहुंचाएंगे, और कण जितने छोटे होंगे वह उतना ही अधिक नुकसान पहुंचाएंगे। अगर इन कणों का आकार 2.5 माइक्रोमीटर से छोटा है तो इन्हें फ़ाईन पार्टिकल कहेंगे और यही सबसे घातक हैं, जोकि अल्वियोलाई स्तर तक घुसकर नुकसान पहुंचाते हैं।

अजगरबत्ती के जलने से सबसे अधिक मात्रा में यही 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे आकार के पार्टिकल्स पैदा होते हैं जो श्वास रोगों का कारण बनते हैं। अजगरबत्ती के जलने से उत्पन्न हुई कार्बन मोनोऑक्साइड गैस के कारण कुछ लोगों में सिरदर्द, चक्कर आना, कमजोरी और उल्टी आने की शिकायत हो सकती है। सल्फर डाई ऑक्साइड से फेफड़ों में इरिटेशन हो सकती है जिससे खांसी आ सकती है।

इसके अतिरिक्त जो बैंजीन, टोलुइन और जाइलिन पैदा होती है उससे कैंसर हो सकता है, लीवर डैमेज हो सकता है, किडनी डैमेज हो सकती हैं और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र डैमेज हो सकता है। पैदा हुए एल्डिहाइड से त्वचा, आंखों और श्वसन तंत्र में इरिटेशन हो सकता है।

कुछ लोगों में नाक की श्लेष्मा झिल्ली सूख जाती है और नाक में जलन होती है। अजगरबत्ती की खुशबू को दूर तक पहुंचाने के लिए डी ई पी (डाई इथाइलपहथलेट) का प्रयोग किया जाता है जो कि कैंसर उत्पन्न करता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस अजगर बत्ती से दूर ही रहें तो बेहतर।

अगर अजगरबत्ती जलाना अतिआवश्यक हो तो जिस कक्ष में इसे जलाया जा रहा है उसमें हवा के आने जाने के उचित प्रबंध होना चाहिए। ऐसे कक्ष में बहुत ज्यादा देर तक खड़े नहीं होना चाहिए। अगरबत्ती जलाने के बजाय शुद्ध देशी घी आग में डालकर हवन किया जाए, या फिर अंगारे के ऊपर देशी घी डालकर उठे धुएँ से उस स्थान को सुवासित किया जाए तो बेहतर होगा।

वैसे मैंने दक्षिण भारत के अधिकतर मंदिरों में देखा है कि वहां पर अजगरबत्ती जलाने का एक निश्चित स्थान तय किया हुआ होता हैं। वह सामान्यतः किसी पेड़ के नीचे खुले में होता है। मुझे यह व्यवस्था बहुत पसंद आई। आप लोग भी कुछ ऐसा ही करिये ना…

#अजगरबत्ती

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Sanjeev Kumar Verma. अजगरबत्ती. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/bb/1239/. Retrieved November 17, 2017.

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About the Author ()

डॉ संजीव कुमार वर्मा, पीएचडी (पशु पोषण), पीजीडीटीएमए; एआरएस भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (ARS) के 1996 बैच के वैज्ञानिक हैं और वर्तमान में भाकृअनुप – केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं| इससे पूर्व डॉ वर्मा अनेक भारतीय संस्थानों में वैज्ञानिक सेवाएं दे चुके हैं। डॉ वर्मा ने लगभग नौ वर्ष तक पहाड़ी और पर्वतीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध के उपरांत लगभग 5 वर्ष तक द्वीपीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध कार्य किया। इसके बाद लगभग पांच वर्ष तक उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में गोवंश पर अनुसंधान करने के बाद लगभग एक वर्ष तक दक्षिणी कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में मुर्गीपालन पर अध्ययन किया। डॉ वर्मा कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों के लेखक होने के साथ-साथ वर्तमान में ‘एनिमल न्यूट्रिशन सोसायटी ऑफ इंडिया’, करनाल के ‘वाइस प्रेजीडेंट’ भी हैं और पशु पोषण के क्षेत्र में लगातार उच्च कोटि के अनुसन्धान एवं आम लोगों, किसानों एवं विद्यार्थियों तक विज्ञान के प्रचार प्रसार में कार्यरत हैं | सोशल मीडिया में डॉ वर्मा “बंशी विचारक” के नाम से जाने जाते हैं और देश के हजारों वैज्ञानिकों, छात्रों, एवं किसानों द्वारा लगातार फॉलो किये जाते हैं |

Comments (3)

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  1. धरा त्रिपाठी says:

    बापरे !!! इतनी खतरनाक चीज़ है अजगरबत्ति ।
    अच्छा हुआ ।हमारे यहां इसका प्रयोग न के बराबर है !
    हम घी और सरसों के तेल का प्रयोग दिये जलाने में करते है।
    बहुत बहुत धन्यवाद आप दोनों वैज्ञानिकों को । आम भाषा में इतनी गम्भीर बात को समझा दिए 👍👍👍

  2. मनीष वार्ष्णेय says:

    भाई साहब क्या धूपबत्ती भी ऐसा ही नुकसान करती है या अगरबत्ती में बांस होने से ऐसा होता है ।

  3. pradeep says:

    और अगर कोयले पे गुग्गल जलाये तो भी हानिकारक है क्या.

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