चांदी: एक विज्ञान कथा

| July 25, 2017 | 3 Comments

कुछ लोग चांदी का चम्मच मुँह में लेकर पैदा होते हैं।

कुछ मेरे जैसे सौभाग्यशाली होते हैं जिन्हें जीवन का पहला ग्रास चांदी के चम्मच से चटाया जाता है।

राजे-महाराजे भी चांदी के बर्तनों में खाना खाया करते थे। मिठाइयों पर चांदी का वर्क लगाया जाता था और बहते पानी में चांदी का सिक्का फेंककर पुण्य कमाया जाता था। औरतों को तो विशेष लगाव होता है चांदी के आभूषणों से।

ढकोसला नहीं है यह सब। विज्ञान है। चांदी वैसे तो हैवी मेटल की कैटेगरी में आता है मगर है बहुत चमत्कारी। इसका प्रयोग आभूषणों में किया जाए या फिर पानी भरने के बर्तन के रूप में या फिर पानी या अन्य पेय पदार्थ पीने के बर्तन के रूप में।

वैज्ञानिक अध्ययनों से यह सिद्ध हो गया है कि अगर पानी या अन्य पेय पदार्थ भरकर रखने और पीने के बर्तन के रूप में चांदी के बर्तनों का उपयोग किया जाए तो उनमें रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं की वृद्धि रुक जाती है। यह पाया गया कि जब चांदी के तीन बर्तनों में पानी लेकर उसमें पेचिस, हैजा और टाइफाईड पैदा करने वाले जीवाणुओं को डालकर 37 डिग्री तापमान पर इनक्यूबेट किया गया तो मात्र एक घंटे में ही इनके जीवाणु समाप्त हो गए।

चांदी की इसी प्रोपर्टी का प्रयोग उन स्थानों के लिए किया जा सकता है जहां पर बिजली और पानी शुद्ध करने वाले उपकरणों की अनुपलब्धता के कारण पानी का शोधन असंभव है। उन ग्रामीण क्षेत्रों में पानी स्टोर करने के लिए अगर चांदी के बर्तन प्रयोग करने की संस्तुति की जाए तो इन घातक बीमारियों से मानव जीवन को बचाया जा सकता है।

नवजात को चांदी के चम्मच से शहद चटाने के पीछे भी यही कारण है कि चांदी जर्म्स फ्री होती है और उसमें जो भी तरल डाला जाता है उसे भी जर्म्स फ्री कर देती है।

बहते पानी में चांदी का सिक्का फेंकने के पीछे भी यही विज्ञान था कि सिक्के में मौजूद चांदी घुलघुलकर पानी मे जाएगी और उसका शुद्धिकरण करेगी। महिलाओं द्वारा चांदी के आभूषण पहने जाने के पीछे भी यही विज्ञान था कि ऑक्सीडाइज्ड चांदी त्वचा द्वारा अब्सॉर्ब कर ली जाती है जिसका मानव स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। तो हैं ना गुणकारी चांदी….

Silver as purifier

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Sanjeev Kumar Verma. चांदी: एक विज्ञान कथा. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/bb/1245/. Retrieved November 17, 2017.

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About the Author ()

डॉ संजीव कुमार वर्मा, पीएचडी (पशु पोषण), पीजीडीटीएमए; एआरएस भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (ARS) के 1996 बैच के वैज्ञानिक हैं और वर्तमान में भाकृअनुप – केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं| इससे पूर्व डॉ वर्मा अनेक भारतीय संस्थानों में वैज्ञानिक सेवाएं दे चुके हैं। डॉ वर्मा ने लगभग नौ वर्ष तक पहाड़ी और पर्वतीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध के उपरांत लगभग 5 वर्ष तक द्वीपीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध कार्य किया। इसके बाद लगभग पांच वर्ष तक उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में गोवंश पर अनुसंधान करने के बाद लगभग एक वर्ष तक दक्षिणी कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में मुर्गीपालन पर अध्ययन किया। डॉ वर्मा कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों के लेखक होने के साथ-साथ वर्तमान में ‘एनिमल न्यूट्रिशन सोसायटी ऑफ इंडिया’, करनाल के ‘वाइस प्रेजीडेंट’ भी हैं और पशु पोषण के क्षेत्र में लगातार उच्च कोटि के अनुसन्धान एवं आम लोगों, किसानों एवं विद्यार्थियों तक विज्ञान के प्रचार प्रसार में कार्यरत हैं | सोशल मीडिया में डॉ वर्मा “बंशी विचारक” के नाम से जाने जाते हैं और देश के हजारों वैज्ञानिकों, छात्रों, एवं किसानों द्वारा लगातार फॉलो किये जाते हैं |

Comments (3)

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  1. मनीष वार्ष्णेय says:

    बहुत ज्ञानवर्धक ।

  2. धरा त्रिपाठी says:

    By mistake I pressed 2 stars ..Now unable to undo .
    I’m giving 5 stars 😊👍 .
    Excellent artical sir .

  3. Mukesh Kumar Vishal says:

    Informative

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