दशानन के दस सिर
दशानन का चौथा सिर: फाइटिक एसिड या फाइटेट

| October 25, 2017 | 0 Comments

जैसे घट-घट में राम है उसी तरह घर-घर में रावण भी है।

दस लेखो की इस सीरीज में हम आपको रावण से मिलवाते हैं। जी हाँ वही प्रकांड पंडित महा विद्वान् राक्षस रावण जिसे दशानन भी कहा जाता है।

हमारा दशानन लंका में नहीं रहता। वह रहता है आपकी रसोई में। आप रोज उसे खाते हैं और आपको पता भी नहीं चलता | प्रकांड पंडित किन्तु वर्ण से राक्षस दशानन आपको हानि भी पहुंचा सकता है और लाभ भी |

कौन है वो रावण? कैसा दिखता है? हम उसे कैसे खाते हैं? जब हम उसे खाते है तो हमें क्या हानि होती है, और क्या लाभ हो सकता है? आइये जानते है दशानन के दस सिरों का यह राज दस लेखो की इस सीरीज में |

इस सीरीज का प्रथम लेख था, दशानन का पहला सिर…. प्रोटीएज इनहिबिटर।”

और द्वितीय लेख था – दशानन का दूसरा सिर: लाइपेज इनहिबिटर। 

तीसरा लेख – दशानन का तीसरा सिर: एमाइलेज इनहिबिटर

प्रस्तुत है इसी सीरीज का चौथा लेख – दशानन का चौथा सिर: फाइटिक एसिड या फाइटेट।

फाइटिक एसिड या फाइटेट। यही वह चीज है जिसके अंदर फॉस्फोरस कैद रहता है और यह मिलता है मुख्यतः अनाजों के चोकर और बीजों में।

मगर ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। फाइटेट से फॉस्फोरस को मुक्त करने के लिए एक एंजाइम की आवश्यकता पड़ती है जिसका नाम है फाइटेज। ये फाइटेज जुगाली करने वाले जानवरों में तो होता है मगर और किसी भी जानवर में नहीं होता। ना मनुष्यों में होता। इसलिए गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि तो अनाजों और चोकर में मौजूद फाइटेट के अंदर कैद फॉस्फोरस को छुड़ा कर प्रयोग कर लेते हैं मगर हम नहीं कर पाते।

जुगाली करने वाले जानवरों में भी फाइटेज उनका खुद का नहीं होता। यह रिलीज किया जाता है उनके रुमेन में पाए जाने वाले जीवाणुओं द्वारा। जुगाली ना करने वाले जानवरों और मनुष्यों में चूंकि रुमेन होता ही नहीं तो रुमेन वाले जीवाणु भी नहीं होते और फाइटेज भी नहीं होता। इसीलिए सुअर, मुर्गी और मछली की पोट्टी से बनी खाद में फाइटेट खूब होता है। इतना ज्यादा होता है कि जहां यह डाली जाती है वहां बढ़वार बहुत ज्यादा होती है।

अगर तालाबों में डाल दी जाए तो वहां जलीय पौधों की पैदावार इतनी बढ़ जाती है कि वहाँ ऑक्सीजन की कमी तक हो जाती है। इन सब की बातें फिर कभी। पौधों के लिए तो फाइटेट का होना फायदेमंद है क्योंकि यह पौधे के लिए फॉस्फोरस का स्टोर करता है जो समय-समय पर ऊर्जा उत्पादन में काम आता है। मगर हमारे लिए नहीं।

कहते हैं ना एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा। तो फाइटेट भी कुछ ऐसा ही है। पहले तो फॉस्फोरस को रिलीज नहीं होने दिया ऊपर से कैल्सियम, जिंक और आयरन को भी पकड़ कर बैठ जाता है। फाइटेट से मिलने पर ये सब इन्सोलुबिल प्रेसिपिटेट बनाते हैं और इनका अवशोषण नहीं हो पाता।

दशानन के इस राक्षसी रूप का अंत दो देवता करते हैं। अग्नि देवता और जल देवता। भोजन पकाने के दौरान फाइटिक एसिड कम हो जाता है। दूसरे खाद्य अनाजों और दालों को रात भर भिगोने से भी फाइटिक एसिड कम हो जाता है।

तिल, कद्दू के बीजों, अलसी, बीन्स, सोयाबीन, बादाम आदि में फाइटिक एसिड बहुतायत में पाया जाता है। इसलिए बादाम को भिगो कर खाने की सलाह दी जाती है। दालों को स्प्राउट करके खाने की सलाह दी जाती है। कद्दू के बीज खाने से मना किया जाता है। तिल और अलसी को भूनकर खाने को कहा जाता है।

कच्चे तिल खाओगे तो कैल्शियम, जिंक और आयरन की कमी हो जाएगी। अब दशानन के दूसरे स्वरूप की। राक्षस है तो देवता भी है यह। फाइटेट से कैंसर का ईलाज सम्भव है। कैसे???? फिर कभी।

बंशी विचारक

रावण

दशानन के दस सिर सीरीज का चतुर्थ लेख

Cite this Article


Sanjeev Kumar Verma. दशानन के दस सिर
दशानन का चौथा सिर: फाइटिक एसिड या फाइटेट
. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/bb/1476/. Retrieved December 14, 2017.

Tags:

blank

About the Author ()

डॉ संजीव कुमार वर्मा, पीएचडी (पशु पोषण), पीजीडीटीएमए; एआरएस भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (ARS) के 1996 बैच के वैज्ञानिक हैं और वर्तमान में भाकृअनुप – केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं| इससे पूर्व डॉ वर्मा अनेक भारतीय संस्थानों में वैज्ञानिक सेवाएं दे चुके हैं। डॉ वर्मा ने लगभग नौ वर्ष तक पहाड़ी और पर्वतीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध के उपरांत लगभग 5 वर्ष तक द्वीपीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध कार्य किया। इसके बाद लगभग पांच वर्ष तक उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में गोवंश पर अनुसंधान करने के बाद लगभग एक वर्ष तक दक्षिणी कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में मुर्गीपालन पर अध्ययन किया। डॉ वर्मा कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों के लेखक होने के साथ-साथ वर्तमान में ‘एनिमल न्यूट्रिशन सोसायटी ऑफ इंडिया’, करनाल के ‘वाइस प्रेजीडेंट’ भी हैं और पशु पोषण के क्षेत्र में लगातार उच्च कोटि के अनुसन्धान एवं आम लोगों, किसानों एवं विद्यार्थियों तक विज्ञान के प्रचार प्रसार में कार्यरत हैं | सोशल मीडिया में डॉ वर्मा “बंशी विचारक” के नाम से जाने जाते हैं और देश के हजारों वैज्ञानिकों, छात्रों, एवं किसानों द्वारा लगातार फॉलो किये जाते हैं |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *