दशानन के दस सिर
दशानन का षष्टम सिर: ग्लूकोसिनोलेट

| November 9, 2017 | 0 Comments

जैसे घट-घट में राम है उसी तरह घर-घर में रावण भी है।

दस लेखो की इस सीरीज में हम आपको रावण से मिलवाते हैं। जी हाँ वही प्रकांड पंडित महा विद्वान् राक्षस रावण जिसे दशानन भी कहा जाता है।

हमारा दशानन लंका में नहीं रहता। वह रहता है आपकी रसोई में। आप रोज उसे खाते हैं और आपको पता भी नहीं चलता | प्रकांड पंडित किन्तु वर्ण से राक्षस दशानन आपको हानि भी पहुंचा सकता है और लाभ भी |

कौन है वो रावण? कैसा दिखता है? हम उसे कैसे खाते हैं? जब हम उसे खाते है तो हमें क्या हानि होती है, और क्या लाभ हो सकता है? आइये जानते है दशानन के दस सिरों का यह राज दस लेखो की इस सीरीज में |

इस सीरीज का प्रथम लेख था, दशानन का पहला सिर…. प्रोटीएज इनहिबिटर।”

और द्वितीय लेख था – दशानन का दूसरा सिर: लाइपेज इनहिबिटर।

तीसरा लेख – दशानन का तीसरा सिर: एमाइलेज इनहिबिटर

चौथा लेख – दशानन का चौथा सिर: फाइटिक एसिड या फाइटेट।

दशानन का पांचवा सिर: ऑक्जेलिक एसिड या ऑक्सालेट

आइये जानते हैं दशानन के छटवे सिर के बारे में…

दशानन का छठा सिर है…. ग्लूकोसिनोलेट।

कुदरत ने जिसे भी इस ‘गोला’ पर भेजा है उसे स्वयं की रक्षा के लिए भी कुछ ना कुछ देकर भेजा है।

पौधों को कीड़े मकोड़ों से स्वयं को बचाने के लिए दिए हैं एन्टी न्यूट्रिशनल कंपाउंड्स। उन्हीं को हमने दशानन के सिरों की संज्ञा दी है। अभी तक आपने पांच सिरों के बारे में जाना। बात करते हैं छठे सिर की।

ग्लूकोसिनोलेट ऐसा कम्पाउंड है जो कम से कम 200 रूपों में क्रुसिफर क्रॉप्स की 375 जेनेरा और 3200 स्पीसीज में पाया जाता है।

इसी के कारण इन फसलों में कीड़े नहीं लग पाते। मगर कुछ खास कीड़े ऐसे भी हैं जिन्होंने इस कंपाउंड पर भी विजय प्राप्त कर ली है। और पौधे में ग्लूकोसिनोलेट होने के बावजूद भी उसे खा जाते हैं।

सरसों कुल की फसलों में जो बिटर टेस्ट और पन्जेन्सी हमें महसूस होती है वह इस ग्लूकोसिनोलेट के कारण ही है। यह ग्लूकोसिनोलेट हाइड्रोलिसिस के बाद तीन कंपाउंड्स को जन्म देता है और यही तीनों कंपाउंड्स हानि पहुंचाते हैं। बस गनीमत इस बात की है कि सरसों कुल के जो पौधे हम खाते हैं उनमें यह कम मात्रा में होता है।

दूसरे हम उन्हें भली भांति पका कर खाते हैं तो पकाने के दौरान यह डिएक्टिवेट हो जाता है। आपने देखा होगा कि दादी माँ सरसों का साग बनाते समय पहले सरसों के पत्तों को अच्छी तरह धोकर खौलते पानी में पकाती थी। फिर उसे आंच से उतार कर पत्ते बाहर निकाल कर पूरा पानी निचौड़ती थी। फिर उन्हें साफ पानी से धोकर पतीली में घोटती थी। फिर आप उसे मक्का की रोटी के साथ खाते थे। दादी माँ को तो नहीं मगर दादी माँ की दादी माँ की दादी माँ की भी दादी माँ को पता था कि इन पत्तों में ग्लूकोसिनोलेट है और यह तभी खत्म होगा जब इन्हें पकाया जाएगा। बस वही ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है।

अब सरसों के पत्ते तो हमने पका कर साग बना कर खा लिए। सरसों के बीज से तेल निकालकर खा लिया। बाकी बची सरसों की खली जिसमें ग्लूकोसिनोलेट भरपूर बचा है। पशु इसे खाएंगे और ग्लूकोसिनोलेट उन्हें अपना जलवा दिखायेगा। ज्यादा कुछ नहीं यह बस ग्लूकोसिनोलेट से बनेंगे आइसोथायोसाईनेट, थायोसाईनेट और नाइट्राइल्स। ये तीनों आयोडीन का अपटेक घटा देंगे जिससे थाइरोइड हॉर्मोन का उत्पादन कम हो जाएगा।

पशु को भी पता है कि इसे नहीं खाना। मगर वह करे क्या??? आप कर सकते हैं। सरसों की खली को खिलाने से पहले कम से कम भिगो लें। हो सके तो थोड़ा गर्म करलें ताकि ग्लूकोसिनोलेट डिएक्टिवेट हो जाए। ग्लूकोसिनोलेट टॉक्सिसिटी मनुष्यों में शायद ही कभी देखने में आई हो। मगर पशुओं में बहुत देखने में आती है। खासतौर से गाय, भैंस, सुअर और मुर्गी में। क्योंकि इन सभी के दाने में सरसों की खली का प्रयोग बहुतायत में किया जाता है।

ये तो हुई दशानन के रावण स्वरूप की बात। अब बात करते हैं दशानन के राम स्वरूप की।

दशानन दैत्य है तो देवता भी है। ग्लूकोसिनोलेट का दिव्य स्वरूप अब सामने आ चुका है। अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि ग्लूकोसिनोलेट कैंसर का ईलाज है। सरसों कुल की हरी पत्तेदार सब्जियां खाने वालों को रेक्टम और कॉलोन का कैंसर नहीं होता। ग्लूकोसिनोलेट के कारण लिवर से कुछ ऐसे एंजाइम्स का स्राव होता है जो कैंसर पैदा करने वाले टॉक्सिन्स को डिटॉक्सीफाई कर देते हैं।

तो बस इन सर्दियों में जमकर सरसों का साग और मक्का की रोटी खाओ। गोभी खाओ और खूब गैस छोड़ो। मी लोड भी ना रोक पाएंगे इस प्रदूषण को तो। पड़ोसी को भी तो पता चले कि बन्दा खाते पीते घर का है मूली का परांठा खाकर आया है।

बंशी विचारक

रावण

दशानन के दस सिर सीरीज का षष्टम लेख

Cite this Article


Sanjeev Kumar Verma. दशानन के दस सिर
दशानन का षष्टम सिर: ग्लूकोसिनोलेट
. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/bb/1552/. Retrieved December 14, 2017.

Tags:

blank

About the Author ()

डॉ संजीव कुमार वर्मा, पीएचडी (पशु पोषण), पीजीडीटीएमए; एआरएस भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (ARS) के 1996 बैच के वैज्ञानिक हैं और वर्तमान में भाकृअनुप – केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं| इससे पूर्व डॉ वर्मा अनेक भारतीय संस्थानों में वैज्ञानिक सेवाएं दे चुके हैं। डॉ वर्मा ने लगभग नौ वर्ष तक पहाड़ी और पर्वतीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध के उपरांत लगभग 5 वर्ष तक द्वीपीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध कार्य किया। इसके बाद लगभग पांच वर्ष तक उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में गोवंश पर अनुसंधान करने के बाद लगभग एक वर्ष तक दक्षिणी कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में मुर्गीपालन पर अध्ययन किया। डॉ वर्मा कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों के लेखक होने के साथ-साथ वर्तमान में ‘एनिमल न्यूट्रिशन सोसायटी ऑफ इंडिया’, करनाल के ‘वाइस प्रेजीडेंट’ भी हैं और पशु पोषण के क्षेत्र में लगातार उच्च कोटि के अनुसन्धान एवं आम लोगों, किसानों एवं विद्यार्थियों तक विज्ञान के प्रचार प्रसार में कार्यरत हैं | सोशल मीडिया में डॉ वर्मा “बंशी विचारक” के नाम से जाने जाते हैं और देश के हजारों वैज्ञानिकों, छात्रों, एवं किसानों द्वारा लगातार फॉलो किये जाते हैं |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *