दशानन का सप्तम सिर: लेक्टिंस

| November 10, 2017 | 0 Comments

जैसे घट-घट में राम है उसी तरह घर-घर में रावण भी है।

दस लेखो की इस सीरीज में हम आपको रावण से मिलवाते हैं। जी हाँ वही प्रकांड पंडित महा विद्वान् राक्षस रावण जिसे दशानन भी कहा जाता है।

हमारा दशानन लंका में नहीं रहता। वह रहता है आपकी रसोई में। आप रोज उसे खाते हैं और आपको पता भी नहीं चलता | प्रकांड पंडित किन्तु वर्ण से राक्षस दशानन आपको हानि भी पहुंचा सकता है और लाभ भी |

कौन है वो रावण? कैसा दिखता है? हम उसे कैसे खाते हैं? जब हम उसे खाते है तो हमें क्या हानि होती है, और क्या लाभ हो सकता है? आइये जानते है दशानन के दस सिरों का यह राज दस लेखो की इस सीरीज में |

इस सीरीज का प्रथम लेख था, दशानन का पहला सिर…. प्रोटीएज इनहिबिटर।”

और द्वितीय लेख था – दशानन का दूसरा सिर: लाइपेज इनहिबिटर।

तीसरा लेख – दशानन का तीसरा सिर: एमाइलेज इनहिबिटर

चौथा लेख – दशानन का चौथा सिर: फाइटिक एसिड या फाइटेट।

दशानन का पांचवा सिर: ऑक्जेलिक एसिड या ऑक्सालेट

दशानन का छठा सिर था…. ग्लूकोसिनोलेट।

आइये जानते हैं दशानन के सातवे सिर के बारे में…

दशानन के सातवें सिर का नाम है….. लेक्टिंस।

लेक्टिंस एक प्रकार से हैं तो प्रोटीन ही। यह प्रोटीन पौधे के काम की तो है मगर किसी और के काम की नहीं। यह पौधे को बचाती है कीड़े-मकोड़ों से और बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं से और मुख्यतः पाई जाती है दालों और अनाजों में।

अनाजों और दालों के बीज के उस भाग में जो अंकुरण के पश्चात पत्तियां बनाएगा और इसे कहते हैं कोटीलेडॉन। लेक्टिंस के कारण ही कुछ बीज मानव और पशुओं के शरीर से बिना पचे ही बाहर निकल जाते हैं और इस प्रकार से जाने-अनजाने में उनका डिस्पर्सल भी हो जाता है।

दशानन का यह रूप करता क्या है? पेट के अंदर यह इंटेस्टाइनल लाइनिंग को खराब कर देता है। अगर लेक्टिंस ज्यादा मात्रा में खा ली जाए तो हमारा मस्तिष्क जीआई ट्रैक्ट को खाली करने का संदेश जारी कर देगा और पेट में मरोड़ उठेगी, उल्टी आएगी और दस्त भी लग जाएंगे।

इस दशानन का अंत कैसे हो सकता है? भिगोकर, फर्मेंटेशन कराकर, अंकुरण कराकर और पकाकर ही इस दैत्य राज का खात्मा किया जा सकता है। दालों में यह सबसे ज्यादा पाया जाता है राजमा, सोयाबीन और मूंगफली में। कच्चे राजमे में यह 20000 से 70000 लेक्टिन यूनिट तक पाया जाता है मगर राजमा पकाने पर यह मात्र 200 से 400 यूनिट ही रह जाता है। सप्राउटिंग का ड्यूरेशन जितना ज्यादा होगा लेक्टिंस कंटेंट उतना ही कम हो जाएगा।

याद आया होगा कि दादी माँ दाल बनाने से पहले उसे रात भर भिगोती क्यों थी!!!! उनकी सबसे बड़ी दादी माँ को पता था कि भिगोने से दाल का यह दशानन खत्म हो जाएगा। आजकल की फैशनेबल गृहणियां ब्रांडिड दाल के पैकेट से दाल लेकर सीधे कुकर में डाल देती हैं। भिगोने का झंझट कौन पाले!!!

अगर लेक्टिन डिएक्टिवेट नहीं हुआ तो पता है क्या करेगा??? यह जाकर लेप्टिन हॉर्मोन से मिल जाएगा। उसे भी डिएक्टिवेट कर देगा। और अगर लेप्टिन खामोश हो गया तो आपके ऊपर मोटापे का आक्रमण हो जाएगा। लेप्टिन ही है जो हमें मोटापे से बचाता है। लेप्टिन हॉर्मोन भूख को कम करता है। लेप्टिन डिएक्टिवेट हो गया तो भूख को कम कौन करेगा? लिहाज़ा व्यक्ति खाता जाएगा और मोटा हो जाएगा।

एक बात और लेक्टिंस ड्राई हीट से डिएक्टिवेट नहीं होती। कुछ याद आया कि दादा जी क्यों मना करते थे पेट भरकर मूंगफली खाने के लिए!!! उन्हें पता था कि मूंगफली में जो लेक्टिंस है वह भूनने के दौरान डिएक्टिवेट नहीं हुआ है। अगर बच्चे ने ज्यादा मूंगफली खाई तो इसके पेशाब में जलन हो जाएगी। डॉक्टरी भाषा में बोले तो यूटीआई हो जाएगा। सब पता था हमारे पूर्वजों को।

अरण्ड का नाम सुना होगा आपने। अरण्ड बोले तो कैस्टर। वही कैस्टर आयल वाला कैस्टर। उसमें होता है ‘रिसिन’। यह भी लेक्टिंस ही है। कभी-कभी ग्रामीण बच्चे खेल-खेल में कैस्टर खा कर आ जाते हैं। बहुत जहरीला होता है यह। प्यूरीफाइड रिसिन पाउडर के कुछ दाने एक स्वस्थ मनुष्य को यमलोक पहुँचा सकते हैं। सौ किलो के आदमी को बस 2.2 मिलीग्राम का इंजेक्शन बहुत है। अगर खाया जाए तो बस 100 मिलीग्राम। अरण्ड के बीस दाने माने काम तमाम। इसकी चर्चा फिर कभी… अब दशानन के देवता रूप की चर्चा।

दशानन का सातवां सिर राक्षस है तो देवता भी है। इसी सिर का उपयोग मेडिकल रिसर्च में बहुतायत से किया जाता है। लेक्टिंस के द्वारा ही ब्लड टाइपिंग की जाती है। बोले तो ब्लड ग्रुप पहचानने के काम आता है। राजमे से निकली लेक्टिंस का प्रयोग न्यूरोसाइंस में किया जाता है। कोशिकीय स्तर पर विभिन्न प्रक्रियाओं को समझने के लिए लेक्टिंस का ही उपयोग होता है। एक सामान्य पाठक के लिए इतना ही जानना काफी है कि लेक्टिंस अगर राक्षस है तो देवता भी है जिसके कारण मेडिकल साइंस में बारे में हमारी समझ अधिक विकसित होती है।

बोलो दशानन के सातवें सिर की जय।

बंशी विचारक

रावण

दशानन के दस सिर सीरीज का सप्तम लेख

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Sanjeev Kumar Verma. दशानन का सप्तम सिर: लेक्टिंस. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/bb/1555/. Retrieved January 20, 2018.

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About the Author ()

डॉ संजीव कुमार वर्मा, पीएचडी (पशु पोषण), पीजीडीटीएमए; एआरएस भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (ARS) के 1996 बैच के वैज्ञानिक हैं और वर्तमान में भाकृअनुप – केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं| इससे पूर्व डॉ वर्मा अनेक भारतीय संस्थानों में वैज्ञानिक सेवाएं दे चुके हैं। डॉ वर्मा ने लगभग नौ वर्ष तक पहाड़ी और पर्वतीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध के उपरांत लगभग 5 वर्ष तक द्वीपीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध कार्य किया। इसके बाद लगभग पांच वर्ष तक उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में गोवंश पर अनुसंधान करने के बाद लगभग एक वर्ष तक दक्षिणी कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में मुर्गीपालन पर अध्ययन किया। डॉ वर्मा कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों के लेखक होने के साथ-साथ वर्तमान में ‘एनिमल न्यूट्रिशन सोसायटी ऑफ इंडिया’, करनाल के ‘वाइस प्रेजीडेंट’ भी हैं और पशु पोषण के क्षेत्र में लगातार उच्च कोटि के अनुसन्धान एवं आम लोगों, किसानों एवं विद्यार्थियों तक विज्ञान के प्रचार प्रसार में कार्यरत हैं | सोशल मीडिया में डॉ वर्मा “बंशी विचारक” के नाम से जाने जाते हैं और देश के हजारों वैज्ञानिकों, छात्रों, एवं किसानों द्वारा लगातार फॉलो किये जाते हैं |

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