घी पुराण: डॉ संजीव कुमार वर्मा

| November 28, 2017 | 0 Comments

दूध में सामान्यतः 2.5 से 6 प्रतिशत तक वसा होती है। मिल्क फैट वस्तुतः विभिन्न फैटी एसिड एस्टर्स जिन्हें ट्राइग्लिसराइड्स भी कहते हैं का मिश्रण है। ये फैटी एसिड्स भी दो तरह के हैं 1. सैचुरेटिड और 2. अनसैचुरेटेड। सैचुरेटिड में मुख्य हैं ब्यूटाईरिक एसिड, कैपरोइक एसिड, कैपरिक एसिड, कैप्रिलिक एसिड, लॉरिक एसिड, माईरिस्टिक एसिड, पामिटिक एसिड और स्टीयरिक एसिड और अनसैचुरेटेड में मुख्य हैं ओलिक एसिड और लिनोलिक एसिड।

दूध से अगर हम इस वसा को अलग कर लें तो इसे क्रीम कहेंगे और क्रीम निकले हुए दूध को सप्रेटा दूध। अब इस क्रीम से ही या तो बटर बनेगा या फिर घी। बटर बनाने के लिए क्रीम की कुछ प्रोसेसिंग करनी पड़ेगी। पहले तो क्रीम को 95 डिग्री पर पाश्चुरीकृत करेंगे ताकि उसके अंदर मौजूद कोई भी एंजाइम या फिर कीटाणु मर जाए। क्रीम को ठंडा होने के बाद राइपनिंग टैंक में रखेंगे। राइपनिंग 20 से 22 डिग्री पर 12 से 15 घन्टे में होगी। राइपनिंग के बाद ही फैट ग्लोब्युल्स क्रिस्टलाइन स्ट्रक्चर लेंगे। इसके बाद चरनिंग की जाएगी।

अगर बटर को सालटिड बनाना है तो उसमें नमक भी मिलाया जाएगा। घी बनाने के लिए बटर को एक निश्चित तापमान पर गर्म किया जाएगा और इसी दौरान उसका पूरा पानी सूख जाएगा और वह घी में बदल जायेगा। ये तो हुआ बटर और घी बनाने का आधुनिक तरीका। एक तरीका वह था जो हमारे दादी की दादी की दादी माँ प्रयोग में लाती थी। दूध का दही जमाया। दही को मथा तो बटर निकला और फिर बटर को गर्म किया तो घी बना। दोनों तरीकों से बने घी में जमीन आसमान का अंतर है। व्यावसायिक तरीके से बने घी में वह खुशबू नहीं होती जो देशी तरीके से बने घी में होती है।

अब आते हैं घी पर…

घी गाय के दूध से बना हो या भैंस के दूध से। दोनों लगभग एक ही जैसे हैं। फिर भी क्रिटिकली देखें तो गाय का घी भैंस के घी से बेहतर है। ये तो आप सभी को पता ही है कि घी में नमी नहीं होती। बटर से घी बनाते समय सारा पानी भाप बनकर उड़ जाता है। घी में पानी आधा प्रतिशत से भी कम होता है। गाय और भैंस के घी में जो प्रमुख अंतर हैं वह है कैरोटीन की मात्रा। कैरोटीन के कारण ही गाय का घी पीला दिखता है जबकि भैंस का घी हरी रंगत लिए होता है जोकि बाइल पिगमेंट्स के कारण होता है।

गाय के घी में कैरोटीन 3.2 से 7.4 प्रतिशत तक होता है जबकि भैंस के घी में यह नहीं होता।

गाय के घी में विटामिन ए 19-34 आईयू/ ग्रा. होता है जबकि भैंस के घी में यह 17-38 आईयू/ ग्रा. होता है।

गाय के घी में कोलेस्ट्रॉल थोड़ा ज्यादा होता है। गाय के घी में कोलेस्ट्रॉल 3-3.6 मिलीग्राम/ग्राम होता है जबकि भैंस के घी में यह 2.1 से 3.1 मिलीग्राम/ग्राम होता है।

इसी तरह गाय के घी में टोकोफेरोल 26-48 मिलीग्राम/ग्राम होता है जबकि भैंस के घी में 18-31 मिलीग्राम/ग्राम।

कई बार भैंस के घी को सुपीरियर बताने वाले दलील देते हैं कि गाय के घी में ज्यादा कोलेस्ट्रॉल होता है। हाँ होता है तो क्या हुआ!  सही बात यह है कि शरीर में मौजूद 80 प्रतिशत कोलेस्ट्रॉल का निर्माण शरीर ने खुद किया है। लीवर महाशय जिम्मेदार हैं इस कोलेस्ट्रॉल निर्माण के लिए। खाने में खाये गए कोलेस्ट्रॉल का तो मात्र 20 प्रतिशत योगदान है शरीर में मौजूद कुल कोलेस्ट्रॉल में।

लीवर खाई गई शुगर, वसा और प्रोटीन से हर समय कोलेस्ट्रॉल का निर्माण करता रहता है चूंकि शरीर की विभिन्न क्रियाओं के लिए कोलेस्ट्रॉल आवश्यक भी है। कोलेस्ट्रॉल तो बस बदनाम है। सारा घपला तो इस मीठे ने किया हुआ है। लोग खाते मीठा हैं बोलते कड़वा हैं।

अब बात करते हैं सीएलए की।

सीएलए बोले तो कंजुगेटिड लिनोलिक एसिड। ये जो सीएलए है ये फैटी एसिड्स का ही एक रूप है। ज्यादा बायोकेमिस्ट्री में ना जाकर इसके फायदे देखते हैं कि क्या हैं? जिनके भोजन में सीएलए ज्यादा होता है उनको टाइप 2 डाइबिटीज और कैंसर होने का खतरा कम होता है। सीएलए ज्यादा है गाय के घी में। टोटल ओमेगा 6 फैटी एसिड ज्यादा हैं गाय के घी में। पुफ़ा ज्यादा है गाय के घी में।

एनडीआरआई के डॉ केके सिंघल और डॉ अमरीश त्यागी साहब ने 2008 में एक पेपर पब्लिश किया था इसी अध्ययन पर आधारित। जिस गाय को हरा चारा दिया गया उसके दूध में सीएलए की मात्रा और भी बढ़ गयी। बढ़ी तो भैंस के घी में भी मगर गाय में ज्यादा बढ़ी।

इसके अलावा घी बनाने की विधि का भी सीएलए कंटेंट पर प्रभाव पड़ता है। जब क्रीम से घी बनाया गया तो सीएलए कम था और जब ट्रेडिशनल विधि से घी बनाया गया तो सीएलए ज्यादा था।

कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि पारंपरिक विधि से गाय के दूध से बने घी में सीएलए ज्यादा होगा। उस गाय के दूध में और भी ज्यादा होगा जो हरा चारा खाती है और यही सीएलए डायबिटीज और कैंसर नहीं होने देगा।

अब आते हैं घी की खुशबू पर।

खुशबू निर्भर करती है घी में मौजूद कार्बोनिल कंपाउंड्स और लैक्टोन्स पर। ये कहाँ से आते हैं घी में? ये बनते हैं तब जब दूध की दही बनाई जाती है और जब बटर की गर्म करके घी बनाया जा रहा होता है तब। पूरी केमिस्ट्री है कार्बोनिल और लैक्टोन्स की। संक्षेप में यही समझ लो कि अगर दूध की दही जमा कर फिर उसे मथकर मक्खन निकालकर मक्खन से घी बनाएंगे तो उसमें गजब की खुशबू होगी। बोले तो घी बनाने के पारंपरिक तरीके का कोई मुकाबला नहीं है।

तो रहिये मस्त और खाते रहिये देशी गाय का देशी तरीके से बना घी वो भी उस गाय का जिस गाय को भरपेट हरा चारा खिलाया गया हो।

बंशी विचारक

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Sanjeev Kumar Verma. घी पुराण: डॉ संजीव कुमार वर्मा. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/bb/1590/. Retrieved January 20, 2018.

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About the Author ()

डॉ संजीव कुमार वर्मा, पीएचडी (पशु पोषण), पीजीडीटीएमए; एआरएस भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (ARS) के 1996 बैच के वैज्ञानिक हैं और वर्तमान में भाकृअनुप – केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं| इससे पूर्व डॉ वर्मा अनेक भारतीय संस्थानों में वैज्ञानिक सेवाएं दे चुके हैं। डॉ वर्मा ने लगभग नौ वर्ष तक पहाड़ी और पर्वतीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध के उपरांत लगभग 5 वर्ष तक द्वीपीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध कार्य किया। इसके बाद लगभग पांच वर्ष तक उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में गोवंश पर अनुसंधान करने के बाद लगभग एक वर्ष तक दक्षिणी कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में मुर्गीपालन पर अध्ययन किया। डॉ वर्मा कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों के लेखक होने के साथ-साथ वर्तमान में ‘एनिमल न्यूट्रिशन सोसायटी ऑफ इंडिया’, करनाल के ‘वाइस प्रेजीडेंट’ भी हैं और पशु पोषण के क्षेत्र में लगातार उच्च कोटि के अनुसन्धान एवं आम लोगों, किसानों एवं विद्यार्थियों तक विज्ञान के प्रचार प्रसार में कार्यरत हैं | सोशल मीडिया में डॉ वर्मा “बंशी विचारक” के नाम से जाने जाते हैं और देश के हजारों वैज्ञानिकों, छात्रों, एवं किसानों द्वारा लगातार फॉलो किये जाते हैं |

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