काक चेष्टा, बको ध्यानं, श्वान निंद्रा तथैव च। काक चेष्टा

| May 14, 2017 | 0 Comments

काक चेष्टा, बको ध्यानं, श्वान निंद्रा तथैव च।
अल्पाहारी, सदाचारी एतद विद्यार्थिन पंच लक्षणं।।

हमारे घर के पास एक पीपल का पेड़ था। अभी भी है। हमारे घर के पास था इसलिए भूतों की तो हिम्मत होती नहीं थी कि उस पेड़ पर डेरा डालकर रहें मगर कोओं का एक जोड़ा बड़ा हिम्मती था।

वो आया और वहीं बस गया। हम बच्चा पार्टी तीसरी मंजिल पर जाकर यदा-कदा उनका घोंसला देखते रहते। एक दिन देखा कि उनके घोंसले में पांच छह अंडे रखे हैं। कुछ दिन बाद उनमें से बच्चे निकले। एक दिन हुआ क्या कि एक बाज उनके बच्चों को खाने के लिए आया। दोनों कोएँ चिल्लाने लगे। हम दोनों भाई ऊपर चढ़े तो देखा कि बाज की नीयत सही नहीं है तो मेरे छोटे भाई ने बाज के तरफ एक पत्थर उछाल दिया।

कोएँ ने देख लिया। बस फिर क्या था… बाज तो भाग गया मगर कोएँ ने सोचा कि पत्थर भी उनके बच्चों को तंग करने के लिए फेंका गया था। बस ठन गई दुश्मनी।

वैसे तो मेरे और मेरे छोटे भाई की शक्ल बहुत हद तक मिलती है। यहां तक कि बैंक वाले और टीचर तक गच्चा खा जाते हैं। मगर वो कौए नहीं खाते थे। मैं ऊपर जाता तो कोई बात नहीं मगर छोटा जब भी ऊपर जाता तो सारे काँव-काँव करके इकट्ठे हो जाते। इसलिए जब भी वो ऊपर जाता तो मुझे गार्डिंग के लिए जरूर जाना पड़ता था।

कहने का तात्पर्य यह है कि कोएँ की स्मरण शक्ति विलक्षण होती है।

बचपन में आपने चतुर कोएँ की कहानी अवश्य पढ़ी होगी। ये मात्र कहानी नहीं है। वास्तविकता है। कोएँ में सीखने का गुण विद्यमान होता है। इसकी कुछ जातियाँ तो एवियन आई.क्यू. में टॉप पर हैं। इसीलिए कोएँ को ‘गार्बेज कलेक्शन’ के लिए ट्रेंड भी किया जाता है। ये हमेशा झुंड में रहते हैं और इनमें ‘कम्युनिटी फीलिंग’ बहुत ज्यादा होती है। एक कौआ अगर काँव-काँव कर दे तो सारे आ जाएंगे।

ये कुछ भी खा लेते हैं जैसे दूसरी छोटी चिड़िया, फल, नट्स, घोंघे, केचुए, बीज, मेंढक, दूसरे पक्षियों के अंडे और चूहे आदि।

खानदानी होते हैं ये और अपने बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों के साथ रहते हैं।

फसलों को इतना नुकसान भी नहीं पहुंचाते बल्कि चूहे पकड़ कर फसलों को बचाते ही हैं। मगर कभी-कभी किसी किसी फसल में नुकसान भी पहुंचाते हैं। इनसे बचने के लिए खेत में अगर आदमी का पुतला खड़ा कर दो तो एक दो दिन तो उससे डरते हैं मगर उसके बाद समझ जाते हैं कि ‘मनमोहन सिंह’ है।

हिंदु मान्यताओं में अनुसार तो ये हमारे पूर्वज ही हैं और श्राद्ध पक्ष में तो इनके मजे आ जाते हैं। लोग इन्हें ढूंढते घूमते हैं और सनी देओल पा’जी तो इनके बहुत बड़े फैन हैं। गाना गाते घूम रहे थे गदर फ़िल्म में… उड़ जा काले काँवा तेरे मुँह विच खंड पावा

काक, कव्वा, crow

File photo: Crows. Source Flickr. License AttributionSome rights reserved by ordjuret

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Sanjeev Kumar Verma. काक चेष्टा, बको ध्यानं, श्वान निंद्रा तथैव च। काक चेष्टा. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/bb/635/. Retrieved November 20, 2017.

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डॉ संजीव कुमार वर्मा, पीएचडी (पशु पोषण), पीजीडीटीएमए; एआरएस भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (ARS) के 1996 बैच के वैज्ञानिक हैं और वर्तमान में भाकृअनुप – केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं| इससे पूर्व डॉ वर्मा अनेक भारतीय संस्थानों में वैज्ञानिक सेवाएं दे चुके हैं। डॉ वर्मा ने लगभग नौ वर्ष तक पहाड़ी और पर्वतीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध के उपरांत लगभग 5 वर्ष तक द्वीपीय कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में पशुपालन पर शोध कार्य किया। इसके बाद लगभग पांच वर्ष तक उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में गोवंश पर अनुसंधान करने के बाद लगभग एक वर्ष तक दक्षिणी कृषि पारिस्थितिकीतंत्र में मुर्गीपालन पर अध्ययन किया। डॉ वर्मा कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों के लेखक होने के साथ-साथ वर्तमान में ‘एनिमल न्यूट्रिशन सोसायटी ऑफ इंडिया’, करनाल के ‘वाइस प्रेजीडेंट’ भी हैं और पशु पोषण के क्षेत्र में लगातार उच्च कोटि के अनुसन्धान एवं आम लोगों, किसानों एवं विद्यार्थियों तक विज्ञान के प्रचार प्रसार में कार्यरत हैं | सोशल मीडिया में डॉ वर्मा “बंशी विचारक” के नाम से जाने जाते हैं और देश के हजारों वैज्ञानिकों, छात्रों, एवं किसानों द्वारा लगातार फॉलो किये जाते हैं |

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