जल की बात: कमलजीत के साथ

| May 19, 2017 | 1 Comment

आज जल की बात

वैसे तो आज हम तकनीकों के संक्रमण काल की देहलीज पर खड़े हैं | एक तरफ वो तरीके हैं जिनकी बदौलत हमारे पुरखे बड़ी सहजता से तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए खुद को जिन्दा रखे रहे , दूसरी तरफ वो तरीके हैं जो आज स्वप्न सुंदरियां 30 सेकंड में आकर बता जाती हैं | अब क्या करें ? इसीलिए विज्ञान और तकनीक की मदद से बीच का रास्ता (बुद्ध का) निकाला जाए तो ही बेहतर है|

आज से दस वर्ष पूर्व RO की टेक्नोलॉजी एक दुर्लभ और दूर की कौड़ी होती थी जो कि सिर्फ बड़े बड़े दुबई के शेखों , प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपति आवासों में शान के अफ़साने के जैसे दिखाई जाती थी | लेकिन बाजार के पसार के आगे अब यह घर घर सुलभः है | तकनीक बुरी नहीं है लेकिन यह तकनीक भी डोमेस्टिकेशन मांगती है | अब जानिये कैसे ?

सबसे पहले मैं बात करूंगा के फ्रिज के पानी और मटके के पानी में जो स्वाद का फर्क होता है वो क्यों होता है, दुसरे मटके के ठन्डे जल में संतुष्टि क्यों प्राप्त होती है और फ्रिज का पानी पेट में पत्थर के जैसे क्यों बजता है |

दोस्तों, मिटटी का मटका असल में एक सम्पूर्ण यंत्र हैं जिसकी एनर्जी एफिशिएंसी करोड़ों अरबों गुना है | दरससल एक मिटटी के मटके में खरबों महीन छिद्र होते हैं, और यह छिद्र महीन कैपलारियों के जैसे होते हैं जिनके एक कोने पर जल राशि और दुसरे सिरे पर शुष्क हवा होती है |

हवा की रगड़ से कैपलरी के अंदर दबाव बनता है और पानी बाहर की और आता है हवा की शुष्कता से पानी उड़ने लगता है और पानी में ऑक्सीजन घुलने लगती है और पानी ठंडा भी होने लगता है | (याद कीजिये एक ब्रांड आया था ऑक्सीरिच जो तकीनीकी भसड़ बाजी के चक्कर में फेल हो गया ), जब आप मटके के ठन्डे जल का सेवन करते हैं तो आपके मुहं की बक्क्ल कैविटी में जीभ के आसपास मौजूदा रक्त कोशिकाएं जैसे ही ऑक्सीजन घुले पानी के संपर्क में आती हैं तो शरीर का समूचा तंत्र वाह वाह कर उठता है और संतुष्टि का आभास करवाता है | यदि यही पानी हाथों की ओक बना कर पिया जाए तो हथेली में मौजूद तंत्रिकाएं भी आपको सुख देती हैं

फ्रिज की तकनीक पानी को “कोओफ़फिसिएंट ऑफ़ परफॉरमेंस ” मानक के आधार पर आपका जल ठंडा करती है और बहुत अधिक ऊर्जा खाती है , जल का केवल तापमान कम होता है और हमारे पेट में जो अग्नि प्रदीप्त रहती है उसके ऊपर जब ठंडा जल गिरता है तो वास्तव में पत्थर के जैसे बजता है | दुष्परिणाम बहुत सारे हैं जिनमें से सबसे बड़ा है “कब्ज ” इससे कोलेस्ट्रॉल और बाकि सारे अड़ंगे लिंक्ड हैं |

अब जरा एक मिनट RO की सुन लो, रिवर्स ओसमोसिस नाम तकनीक में एक बहुत महीन जाली अंदर से पानी को दबाव से निकाला जाता है,यहाँ तक बात बिलकुल सही है लेकिन घणे सयानों ने इसी तकनीक में UV लैंप नामक एक चीज और जोड़ दी है |

दरअसल अल्ट्रा वायलेट किरणे हरेक जीवित बैक्टीरिया को प्राणदंड देने में सक्षम हैं, लेकिन ये जब किसी बैक्टीरिया को मारती हैं तो उसके नन्हे शरीर में मौजूद डीएनए में म्यूटेशन करके प्रोटीन को डी नेचर ( स्वरुप बदल ) कर देती हैं | जब हम यह पानी पीते हैं तो हमारे पाचन तंत्र में मौजूद रिसेप्टर इन नए प्रकार की प्रोटीनों को पहचान नहीं पाते और शत्रु समझ कर एंटीबाडी बनानी शुरू कर देते हैं | बस यही कैंसर के सफर का स्टेप -1 है , (इस गंदे गलीज सफर के और भी रास्ते हैं उनका जिक्र बाद में करूँगा )

अब हम क्या कर सकते हैं, घबराने की जरूरत नहीं है |

Kamal Ka Matka for Water Purificationएक बढ़िया मटका या मटकी घर में ले आओ और सीधे RO के नीचे आन टिकाओ | RO का पानी रात को भर दो मटके में |

एक काम और करो एक शुद्ध चांदी का 25 से 50 ग्राम का टुकड़ा सुनार से यह कह कर ले आओ भाई ये मटके में गेरना है कोई मिलावट नहीं चाहिए और मटके में डाल दो | साथियों UV लैंप जो तकलीफ दे रहा था उसको ये ऑक्सीजन से भरपूर पानी ठीक कर देगा | चाँदी थोड़ी थोड़ी घुल कर आपके शरीर में जा कर बहुत काम करेगी |

प्यारों दोस्तों लाडलों इतिहास गवाह है के जब सिकंदर हिन्दुस्तान की सर जमीन पर आया तो उसके लश्कर को सबसे बड़ी तकलीफ मलेरिआ और हैज़ा जैसी वाटर बोर्न बीमारियों ने दी थी | सिकंदर अपने आम सैनिकों के साथ बैठ कर मिटटी के बर्तनो में भोजन करता था जबकि उसके अधिकारी सोने चांदी के बर्तनो में भोजन करते थे | चांदी के लगातार संपर्क में रहने से अधिकारी वर्ग बिमारियों से बचा रहा और सैनिक और सिकंदर हैजे जैसी बिमारियों से लपेटे गए |

साथियों हम लोग एक प्रकार से स्वर्णिम काल में रह रहे हैं जहाँ हमारे पास भूतकाल का पारम्परिक विज्ञान के साथ साथ आधुनिक विज्ञान की समझ समझ भी है | सबसे ख़ास बात हम लोग इंटरनेट से भी जुड़े हैं | सभ्यता को यदि जीवित रहना है तो कुम्हार बचाने पड़ेंगे | कुम्हार की कृपा के बिना एक पल भी शांति और सुख का नहीं है | भारत की पुरातन संस्कृति और पारम्परिक विज्ञान के भरोसे हम अपना और अपने बच्चों का जीवन जीने समझ और परख से आसान और सुखमय बना सकते हैं|

बस इसी बात पे फेर बाजण दो चिमटा |

Best regards,

 

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Kamal Jeet. जल की बात: कमलजीत के साथ. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/letter/748/. Retrieved November 17, 2017.

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About the Author ()

Kamal Jeet is a trained Food Technologist with Masters in Food Science and Technology from Chaudhary Charan Singh Haryana Agriculture University (CCSHAU), Hisar, Haryana. Kamal Jeet is currently pursuing his LLM at Maharshi Dayanand University (MDU), Rohtak.

Kamal Jeet had been a worker @Grassroot at Haryana Heritage and is also involved in Promoting the Natural Foods and Organic Farming in the country.

Comments (1)

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  1. Prakash Vir Sharma says:

    Recent studies also suggest that the intake of water low in calcium (reverse osmosis water), may be associated with higher risk of fracture in children (Verd Vallespir et al. 1992), certain neurodegenerative diseases (Jacqmin et al. 1994), pre-term birth and low weight at birth (Yang et al. 2002) and some types of cancer (Yang et al. 1997; Yang et al. 1998). In addition to an increased risk of sudden death (Eisenberg 1992; Bernardi et al. 1995; Garzon and Eisenberg 1998), the intake of water low in magnesium seems to be associated with a higher risk of motor neuronal disease (Iwami et al. 1994), pregnancy disorders (so-called preeclampsia) (Melles & Kiss 1992), and some types of cancer (Yang et al. 1999a; Yang et al. 1999b; Yang et al. 1999c; Yang et al. 2000).

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