Science: This Week
हवा से हाइड्रोकार्बन ईंधन

| June 7, 2017 | 0 Comments

इन हफ्ते दो बड़ी वैज्ञानिक खोजों ने मुझे आकर्षित किया है, जो यहाँ विज्ञान के पाठकों के साथ शेयर करना चाहूँगा:

पहली खबर स्विट्ज़रलैंड से:

यहाँ वैज्ञानिको ने अपनी तरह की पहली मशीन बना डाली जो सीधे वातावरण से कार्बन डाई ऑक्साइड को खींच सकती है | इस तरह की मशीन का पहला commercial plant हाल ही में जर्मनी में Zurich के निकट शुरू हो गया | यह मशीन एक वर्ष में लगभग 900 tons – CO2 सीधे वातावरण से कैप्चर करेगी जो लगभग साल भर में दो सौ कारों से निकली कार्बन डाई ऑक्साइड के बराबर है | (1)

यह मशीन The Climeworks AG नमक जर्मन कंपनी ने लगाई है | तकनीकविदों का मानना है कि इस तरह की 250,000  मशीन मिलकर पूरे विश्व की एक प्रतिशत कार्बन डाई ऑक्साइड को खींच सकने में सक्षम होंगी |

sucking carbon directly from the air

जहाँ एक ओर इस मशीन को लेकर अत्यंत उत्साह है, वहीं कुछ तकनीकविदों का मानना है कि इस तरह की मशीन CO2 के उत्सर्जन को कम करने का विकल्प नहीं हो सकती, क्योकि यह प्राकृतिक विधि नहीं है |

लागत भी बहुत ज्यादा है | एक ton CO2 को वातावरण से खींचने में लगभग $1000 का खर्चा आयेगा, जो बिलकुल भी वाजिब नहीं है |

वैसे इस मशीन को वैज्ञानिको ने बहुत सोच समझ कर waste heat recovery facility से निकली heat (गर्मी) से पॉवर-अप किया है और waste heat प्लांट से निकली heat से ही यह मशीन चल रही है |

वातावरण से कैप्चर की गयी Co2 को भूमिगत पाइपों के द्वारा एक ग्रीनहाउस में भेजा जाता है – जहाँ इसका उपयोग सब्जियां जैसे कि टमाटर इत्यादि उगने के लिए किया जा रहा है |

कुछ भी हो, यह एक शुरुवात भर है – इसके नुकसान फायदे तो समय के साथ ही पता चल पायेंगें|

और दूसरी खबर भी स्विट्ज़रलैंड से:

इसी बीच दूसरी खबर Federal Institute of Technology in Lausanne, स्विट्ज़रलैंड से जहाँ एक ग्रेजुएट स्टूडेंट नें गलती से एक परीक्षण कर दिया -जिसमें उसने Co2 को सीधे CO कार्बन मोनो ऑक्साइड एवं ऑक्सीजन (O2) गैसों  में तोड़ दिया | इस CO गैस को अब हाइड्रोजन के साथ मिलकर हाइड्रोकार्बन ईंधन बनाने के लिए परीक्षण चल रहे हैं| जो एनर्जी के अल्टरनेटिव सोर्स की दिशा में एक बड़ी खोज सिद्ध हो सकता है | (2)

यह स्टूडेंट वास्तव में copper oxide के उत्परिवर्तक गुणों का अध्ययन कर रहा था | तभी उसने गलती से  copper oxide के साथ tin oxide के इलेक्ट्रोड का प्रयोग कर लिया | और जैसे ही उसने ऐसा किया, पानी में घुली CO2 – कार्बन मोनो ऑक्साइड बन कर पानी से निकलने लगी, और देखते ही देखते पानी में घुली 90% CO2 की CO बन गयी |

वैज्ञानिक CO2 की CO बनाने के लिए पिछले २० सालों से प्रयास कर रहे थे, किन्तु अब तक किसी तो ऐसा उत्परिवर्तक नहीं मिला था जो इतनी अधिक मात्रा में CO2 को तोड़ कर CO में परिवर्तित कर सके |

इस खोजके साथ ही भविष्य में पेड़ पौधों द्वारा प्राकृतिक तरीके से किये जाने वाले प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को artificial तरीके से मशीन के अन्दर करने में सफलता मिल सकती है – उल्लेखनीय है कि पेड़ पौधे भी COएवं सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के द्वारा अपने लिए एनर्जी का उत्पादन करते हैं |

अगर उपरोक्त दोनों खोजों को मिलकर देखा जाये – तो ऐसा लगता है कि भविष्य में वातावरण के उपस्थित नुकसानदायक कार्बन डाई ऑक्साइड को पकड़ कर artificial Photo Synthesis के द्वारा सीधा पैट्रोल इत्यादि में परिवर्तित करना एक हकीकत बन जायेगा|

अगर ऐसा हुआ, तो भारत जैसे देशो को बहुत फायदा होने वाला है, क्योंकि हमारी हवा में तो कार्बन डाई ऑक्साइड की भरमार है| काश ऐसा हो, और ऐसा भी हो कि यें दोनों तकनीके पेटेंट इत्यादि से मुक्त हों ताकि इनका जी भरकर उपयोग किया जा सके! जो कि असंभव है !

हाँ यह तो संभव है, कि भारत जैसे देश आने वाले समय में अपने वैज्ञानिकों से ही इसी तरह की तकनीकी विकसित करने की उम्मीद करें |

Bibliography and Notes

1.
In Switzerland, a giant new machine is sucking carbon directly from the air. Science. Jun. 1, 2017. https://goo.gl/HbsMUv.
2.
Cheap catalysts turn sunlight and carbon dioxide into fuel. Science. Jun. 6, 2017.https://goo.gl/ZRPXOe.

Cite this Article


Dr Sunil Kumar Verma. Science: This Week
हवा से हाइड्रोकार्बन ईंधन
. In: विज्ञान संग्रह. vigyaan.org. Access URL: http://vigyaan.org/blogs/skv/1051/. Retrieved November 17, 2017.
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About the Author ()

Dr Sunil Kumar Verma is an experienced Principal Scientist with a demonstrated history of working in the research industry for more than 20 years. Skilled in Molecular Medicine, Genetics, Translational Research and Wildlife Forensics, Dr Verma has done his doctorate from the University of Oxford. UK.

He had been the inventor of ‘Universal Primer Technology’ (US Patent 7141364), which led to the establishment of India’s first wildlife forensics cell in the LaCONES of CCMB to provide wildlife forensics services to the nation.

He is also the recipient of several national and international awards and honours, including the 2008 CSIR Technology Award, the 2009 NRDC Meritorious Invention Award of Govt. of India and the 2009 BioAsia Innovation Award in recognition of his contribution to Indian science and technology.

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